सावनी हरित अप्सरा! (गीत) — ममता तिवारी 'मृदुला


प्रकृति की यह लाडली, चुनरिया पहनकर हरा,
धरती पे उतरी अभी, सावनी हरित अप्सरा!

सुरमयी आँखों से वो, छिपे राज़ खोलती है,
बोल सुरीली सरस मधु, कानों में घोलती है।
वादा करती है नया, पृथ्वी को देगी बना,
एक घरौंदा प्यार का, दिल में रख डोलती है!
जुगनुओं-सी नैन-चंचल, खिलखिलाती निर्झर-सी,
चल मृगी-चाल लुभाती, दिल से लगी स्वर्ण-खरा...
उतरी जैसे अप्सरा...

भोली सूरत में अधर, दो गुलाब से मढ़ी हैं,
मोतियों की पाँति-सरिस, मोहनी मुख पर जड़ी है!
अलकों पर कुछ तितलियाँ, मँडराती हैं सदा,
पोर-पोर से झर रही, ख़ुशबू की सतरंगी लड़ी है।
हाथों में जादू रखी, करिश्मा रख बाँह में,
छू दे यह उजड़ा चमन, रंग जाता हरा-भरा...
उतरी जैसे अप्सरा...


— ममता तिवारी 'मृदुला'
(छत्तीसगढ़)

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