चमचमाते हाईवे के एक ओर बसा एक छोटा-सा गाँव है। पंचायत द्वारा बनवाई गई पक्की नालियाँ, पक्की गलियाँ और सड़कें हैं। गाँव के एक छोर पर एक बढ़िया सरकारी स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र एवं पंचायत भवन है। दूसरी ओर ग्रामदेवी का मंदिर, तालाब और सीमेंट की बनी बहुत ऊँची पानी की टंकी है, जिससे 'नल-जल योजना' के तहत हर घर में पाइप से पानी पहुँचता है।
गाँव के सबसे अंतिम छोर पर, जहाँ से दूसरे गाँव की सीमा शुरू होती है, हर शाम मेले-जैसी भीड़ लगती है। देशी-विदेशी हर तरह की शराब यहाँ सरकारी ठेके पर मिलती है।
इसी गाँव में गाँव का सबसे गरीब परिवार रहता है — बड़कू का।
विश्व के कई देशों में युद्ध छिड़ने, बम-बारूद फूटने और अंधाधुंध आधुनिक विकास से जंगलों के कटने व पेड़-पौधों के कम होने के कारण पृथ्वी गर्म हो चुकी है। पूस का महीना है और चाँदनी रात है, पर ठंड बहुत हल्की है।
पहले जो गरीब परिवार थे, उनकी दो पीढ़ियाँ आरक्षण से सरकारी नौकरी पाकर अब शहर में उच्चवर्गीय जीवन जी रही हैं। कुछ खेत-ज़मीन गाँव में बची है, जिसे बड़कू जैसे लोग अधिया या ठेके पर जोतते हैं।
अब बड़कू के पास 'पीएम आवास योजना' का एक पक्का मकान है और लगभग एक एकड़ ज़मीन है। गृह-उद्योग के लिए पत्नी के नाम से निकाली गई सरकारी राशि से दो भैंस और दो गायें हैं। बड़कू अब बैल नहीं रखता, क्योंकि खेती का सारा काम किराए के ट्रैक्टर और हार्वेस्टर से होता है। दूध के व्यवसाय से उसे महीने में 10,000 रुपये की शुद्ध आमदनी होती है। पिता साथ में रहते हैं, पर उनका ख़र्च वृद्धावस्था पेंशन से चल जाता है। एक बेटा है, 6 साल का। दो साल आँगनवाड़ी जाने के बाद अब वह सरकारी स्कूल जाता है, जहाँ दोपहर का मुफ़्त भोजन, स्कूल ड्रेस और पुस्तकें मिलती हैं।
बड़कू की पत्नी सुहागा फिर से गर्भवती है। वह गाँव के स्वास्थ्य केंद्र की एएनएम दीदी और स्वास्थ्य कर्मचारियों की निगरानी में है। हर माह कैल्शियम आदि दवाइियाँ मुफ़्त मिलती हैं और टीके लगते रहते हैं। प्रसव की कोई चिंता नहीं है — सामान्य प्रसव गाँव में ही दीदी करवा देती हैं, कुछ जटिल हुआ तो 'महतारी एक्सप्रेस' एम्बुलेंस तुरंत शहर के बड़े अस्पताल पहुँचा देती है।
सुहागा कहती है, "सुनो जी! इस ठंड में फ़सल की रखवाली करने आपको खेत में नहीं सोना पड़ेगा।"
बड़कू पूछता है, "क्यों?"
"किसानों को 'पीएम किसान योजना' से जो आठ हज़ार रुपये मिलते हैं न, उससे हम खेत में बाड़ लगवा लेंगे। पशुओं से फ़सल सुरक्षित हो जाएगी।"
"हाँ, ठीक ही कहती हो तुम। इस बार यही करेंगे। चलो, भोजन दे दो। सहकारी समिति में हमारा मुफ़्त राशन आ गया है। मुझे सोसाइटी से चावल, दाल, आटा लेने जाना है। आज साइकिल नहीं, बाइक ही ले जाता हूँ।"
"ठीक है," कहकर सुहागा साफ़-सुथरी, उज्ज्वल दीवारों वाले रसोईघर की ओर बढ़ी। अब गाँव के रसोईघर भी काली दीवारों वाले, लकड़ी-कंडों से भरे नहीं होते। यहाँ भी सरकारी योजना से गैस लगभग मुफ़्त-जैसी ही मिलती है। कुछ ही समय में गर्मागर्म, घर के शुद्ध घी से छौंकी हुई दाल, चावल, साग-सब्जी, बारीक प्याज़ और हरी मिर्च डली दही लेकर सुहागा सामने थी।
बड़कू के जाने के बाद सुहागा को प्रसव-पीड़ा शुरू हुई। सुहागा समझ गई। उसने स्वास्थ्य केंद्र वाली नर्स दीदी को फोन किया। अपनी माँ को, जो पास ही के गाँव में रहती थी, बुलाया। बड़कू को फोन लगाया, लेकिन न जाने क्यों आज बड़कू ने न फोन उठाया, न कॉलबैक किया। नर्स और माँ आ चुकी थीं, और सुहागा फिर से एक बिटिया की माँ बन चुकी थी।
सुहागा की चिंता बढ़ गई। सात-आठ घंटे बीत गए, पर बड़कू का कोई पता नहीं। अब रात भी हो गई थी। खोजबीन ज़ोर-शोर से होने लगी।
बड़कू के वृद्ध पिता लाठी टेकते हुए किसी तरह गाँव की गुड़ी के पास पहुँचे। गाँव के बहुत-से लोग वहाँ गंभीर बैठे थे, कई घरों से रोने की आवाज़ें आ रही थीं। बड़कू के पिता को पता चला कि ज़हरीली शराब पीने से इस गाँव और आसपास के गाँवों के भी बहुत-से लोग मर गए हैं। कहाँ-कहाँ, कितने लोग — यह अभी पता नहीं।
बड़कू के पिता का माथा ठनका। बड़कू भी कभी-कभी पीता था। बड़कू के घरवाले और रिश्तेदार उसे ढूँढने निकले।
एक खेत की मेड़ पर पलटी हुई बाइक मिली। पास जाकर सबने देखा — चारों ओर चावल, दाल, आटा बिखरा पड़ा था। कुछ दूर कुछ आवारा मवेशी बैठे जुगाली कर रहे थे। शराब की खाली बोतल एक ओर लुढ़की पड़ी थी, और दूसरी ओर बड़कू खाली अनाज की बोरियों से ढका निश्चल पड़ा था!
— ममता तिवारी 'मृदुला'
(जांजगीर, छत्तीसगढ़)
स्वैच्छिक सेवानिवृत्त शिक्षिका (शासकीय)
साहित्यिक सफर
100 से अधिक साझा संकलनों में सहभागिता।
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रतिदिन रचनाओं का प्रकाशन।
एकल प्रकाशित काव्य-संग्रह
1- वीरानों के बागबाँ
2- साँस-साँस पर पहरे
3- अंजुरी भर समुंदर
4- कलयुग (खण्डकाव्य)
5- शेफालिका
6- निशिगंधा
7- नील-नलीनी (काव्यकथा)
8- अमर लता (गीत-संग्रह)
9- पुस्तक मेरा मित्र
10- पिघलता आईना (गद्य-संग्रह)
11- आँसू (जयशंकर प्रसाद की कृति) का छत्तीसगढ़ी बोली में अनुवाद
12- बशर सहमा हुआ सा है (ग़ज़ल-संग्रह)
13- हर दिन नई उड़ान (मुक्तक-संग्रह)
14- मील के पथना (छत्तीसगढ़ी कविता-संग्रह) — प्रकाशनाधीन
15- पांचाली (महाकाव्य / काव्य-उपन्यास) — सृजनशील
-सम्मान एवं उपलब्धियाँ
विभिन्न संस्थाओं, संस्थानों एवं साहित्यिक समूह-पटलों से चार सौ से अधिक प्रशस्ति-पत्र, प्रशंसा-पत्र एवं प्रमाण-पत्र प्राप्त।
एक कविता पर एशिया रिकॉर्ड धारक।
रॉयल्टी प्राप्त कवयित्री।
विक्रमशिला विश्वविद्यालय से मानद ‘विद्या वाचस्पति’ सम्मान प्राप्त।
वर्तमान निवास – जांजगीर-चाम्पा (छत्तीसगढ़)
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कहानी
प्रेमचंद द्वारा रचित पूस की रात कहानी ने जैसे भीतर से सोचने पर विवश कर दिया था वैसे ही इस कहानी ने झकझोर दिया। आज के समाज की कड़वी सच्चाई।
जवाब देंहटाएंइस रचना के लिए धन्यवाद और शुभकामनाएं 🙏