(सिंहासन ख़ाली करो कि जनता आती है!)कालजयी कविता 'जनतंत्र का जन्म': एक ऐतिहासिक उद्घोष


सदियों की ठंडी-बुझी राख में बुगबुगा उठी,
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है।
दो राह, समय के रथ का घरघर-नाद सुनो,
सिंहासन ख़ाली करो कि जनता आती है!

जनता? हाँ, मिट्टी की मूरतें वही अबूझ,
जाड़े-पाले की कसक सदा सहने वाली।
जब अंग-अंग में लगे साँप हो रहे चूस,
कभी न मुँह खोल दर्द कहने वाली।

जनता? हाँ, लंबी-बड़ी जीभ की वही कसम,
"जनता सचमुच ही बड़ी वेदना सहती है।"
"सो ठीक, मगर, आकी़र इस पर जनमत क्या है?"
है प्रश्न गूढ़, जनता इस पर क्या कहती है?

मानो, जनता हो फूल जिसे जब चाहो सहला लो,
और सजा लो ख़ाली ज्यों ही अपने घर में।
अथवा कोई दूधमुहीं बच्ची ही हो,
जिसे बहलाने के दो-चार खिलौने हों ज़हर-घर में।

लेकिन, होता भूखंड-कंप, तूफान उठते हैं,
जनता जब कोप-कुटिल भृकुटि चढ़ाती है;
दो राह, समय के रथ का घरघर-नाद सुनो,
सिंहासन ख़ाली करो कि जनता आती है।

हुंकारों से महलों की नींव उखड़ जाती,
साँसों के बल से ताज हवा में उड़ता है।
जनता की रोके राह, समय में ताव कहाँ?
वह जिधर चाहती, काल उधर ही मुड़ता है।

अब्दों, शताब्दियों, सहस्त्राब्द का अंधकार बीता;
गवाक्ष अंबर के दहके जाते हैं।
यह और नहीं कोई, जनता का स्वप्न अजय,
चीरते तमस का वक्ष उमड़ते जाते हैं।

सब से बड़ा तोप से भी बढ़कर जनमत का ज्वार,
जहाँ खड़ा होता, वहीं इतिहास बदलता।
अंधकार के उस पार से आती ध्वनियाँ,
जागो, कि जनतंत्र का नया सवेरा ढलता!

यह सब से विराट जनतंत्र जगत का आ पहुँचा,
तैंतीस कोटि हित सिंहासन तैयार करो।
तैंतीस कोटि जनता के सिर पर मुकुट धरो,
आज देवता राजसिंहासन पर बैठेंगे!

आरती लिये तू किसे ढूँढ़ता है मूरख,
मंदिरों, राजप्रसादों में, ख़ानागाहों में?
देवता कहीं सड़कों पर गिट्टी तोड़ रहे,
देवता मिलेंगे खेतों में, खलिहानों में।

फावड़े और हल राजदंड बनने को हैं,
धूसरता सोने से श्रृंगार पाती है।
दो राह, समय के रथ का घरघर-नाद सुनो,
सिंहासन ख़ाली करो कि जनता आती है!

— रामधारी सिंह 'दिनकर'


भारतीय साहित्य और जन-चेतना के इतिहास में कुछ रचनाएँ ऐसी होती हैं जो न केवल अपने समय को चित्रित करती हैं, बल्कि युगों-युगों तक प्रेरणा का स्रोत बन जाती हैं। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' की कविता "जनतंत्र का जन्म" (या लोकप्रिय रूप से "सिंहासन ख़ाली करो कि जनता आती है!") एक ऐसी ही ऐतिहासिक और कालजयी रचना है।

यह कविता 26 जनवरी 1950 को भारत के प्रथम गणतंत्र दिवस के पावन अवसर पर लिखी गई थी। भारत सदियों की औपनिवेशिक दासता और राजशाही के अंधकार से निकलकर एक स्वतंत्र, संप्रभु और लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में जन्म ले रहा था। देश में जनतंत्र (लोकतंत्र) का उदय हो रहा था।

दिनकर जी ने इस अभूतपूर्व और ऐतिहासिक क्षण को अपनी ओजस्वी और शक्तिशाली काव्य-शैली में ढालकर एक ऐसी रचना प्रस्तुत की, जो भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों का प्रतीक बन गई। उन्होंने अनुभव किया कि स्वतंत्रता केवल शासन के परिवर्तन का नाम नहीं है, बल्कि यह जनता के हाथों में सत्ता के हस्तांतरण और जन-आकांक्षाओं के साकार होने का नाम है।

दिनकर जी ने अपनी इस कविता में जनता की शक्ति, उनके त्याग और उनके संघर्षों को बहुत ही सशक्त ढंग से प्रस्तुत किया। वे कहते हैं कि सिंहासन अब ख़ाली हो जाना चाहिए क्योंकि असली शक्ति जनता के हाथों में आ रही है।

"सदियों की ठंडी-बुझी राख में बुगबुगा उठी,
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है।
दो राह, समय के रथ का घरघर-नाद सुनो,
सिंहासन ख़ाली करो कि जनता आती है!"

यह कविता उस समय भारतीय समाज में व्याप्त जोश, उत्साह और परिवर्तन की लहर को स्पष्ट रूप से दर्शाती है। यह न केवल स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदानों को याद करती है, बल्कि देशवासियों को अपने लोकतांत्रिक अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक भी करती है।

"जनतंत्र का जन्म" एक कालजयी रचना इसलिए बन गई क्योंकि यह केवल एक विशिष्ट क्षण की अभिव्यक्ति नहीं है, बल्कि यह एक शाश्वत सत्य को प्रस्तुत करती है—जनता की शक्ति ही सर्वोच्च है।

इस कविता की ओजस्वी भाषा, शक्तिशाली रूपक और प्रतीकात्मकता इसे अद्वितीय बनाते हैं। यह कविता आज भी जब भी लोकतंत्र पर संकट आता है, या जब भी जनता के अधिकारों की बात होती है, तो यह गूँज उठती है। यह कविता भारतीय जन-मानस में गहराई से बसी हुई है और हर दौर में प्रासंगिक रहती है।

'बोधायन पत्रिका' अपने सुधी पाठकों के लिए भारतीय साहित्य की इस अमर काव्य-धरोहर को पुनः प्रस्तुत कर रहा है, जो हमें आज भी याद दिलाती है कि जनतंत्र का अर्थ है जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा शासन।

— बोधायन पत्रिका 

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