घर को स्वर्ग बना लो भैया, काशी-मथुरा भूलोगे,
मातु-पिता की कर लो सेवा, दुनिया का सुख पाओगे।
स्नेह करो जग के बच्चों से, घर में मोद मनाओगे,
जगकर पहले ईश-वंदन कर, दुनिया का सुख पाओगे।
महापुरुष का स्मरण करो तो, निर्मल चरित्र बनाओगे,
स्वर्ग का सुख मेरे भैया, अपने घर में पाओगे।
आस-पास के घर-परिवार से, मित्रता का रिश्ता जोड़ोगे,
काशी-मथुरा-वृंदावन उज्जैन का रास्ता फिर भूलोगे।
श्रद्धा-विश्वास से नाम-संकीर्तन का अभ्यास बनाओगे,
वाल्मीकि, तुलसी, सूर, मीरा, रसखान-सा बन जाओगे।
काशी-मथुरा-वृंदावन का आनंद फिर अपने घर में पाओगे,
आओ मिलकर संकल्प करें, किसी का दिल न दुखाओगे।
फिर तुम राम, कृष्ण, प्रह्लाद, श्रवण-सा बेटा पाओगे,
सीता, राधा, रुक्मिणी, अनसूया-सी बेटी पाओगे।
काशी-मथुरा-वृंदावन उज्जैन निज घर में ही पाओगे,
सदा रहेगा आनंद-महोत्सव, जब मिल नाम राम का गाओगे।
दशरथ, वसुदेव, नंद बाबा-सा शुभ सुख ख़ुद पाओगे!
— राम शंकर शास्त्री
सीतामढ़ी, बिहार
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