मर्यादित उड़ान (कविता) - डॉ. कुमारी सोनी ('सोनिया अनंत')


उड़ने को आकाश खुला, पर अपनी हद मालूम है,
बाँहें फैलाए खड़ी धरा, अपनी सरहद मालूम है।
पंखों में है वेग बड़ा, और हौसलों में जान भी,
माटी से जो जुड़ा रहे, वही मुकम्मल इंसान भी।

ऐसा नहीं पाबंदियों ने, पैरों को जकड़ रखा है,
न ही ऊँचाई के ख़ौफ़ ने, मन को पकड़ रखा है।
आज़ाद हूँ मैं परिंदे-सी, हर पिंजरा तोड़ आई हूँ,
पर अपनी ही जड़ों से, ख़ुद को फिर जोड़ आई हूँ।

उड़ान सबकी चाहत है, आसमाँ सबको लुभाता है,
दिशाहीन जो पंछी हो, वो अक्सर ठोकर खाता है।
लक्ष्यहीन जो उड़े अगर, तो पतन का स्वाद चखोगे,
बिन पतवार की कश्ती ले, बोलो कहाँ तक बचोगे?

इसलिए उड़ूँगी ऊँचा मैं, अपनी मंज़िल पहचान कर,
हवाओं के रुख़ को अपने, ही हक़ में मोड़कर।
हद लाँघ के बेअदब होना, अब मुझे मंज़ूर नहीं,
मर्यादा की उड़ान हो, बस यही दस्तूर सही।


— डॉ. कुमारी सोनी ('सोनिया अनंत')
         नालंदा , बिहार 




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