बरसात (भ्रमर छंद गीत)— राम किशोर पाठक


जन-जन में अति हर्ष, दर्श कर नभ मेघा घनघोर।
शीतल हुई बयार, पपीहा दादुर करते शोर।।

बिसरा आतप दंश, चला है पावस लेकर नेह।
तन का निर्झर स्वेद, त्याग कर भागा सारा देह।।
शांत हुए सब धूल, पड़ी जो रिमझिम उन पर बूँद।
जैसे उर आनंद, ग्रहण करते हों आँखें मूंद।।
आते ही बरसात, बना सबका यह चितचोर।
जन-जन में अति हर्ष, दर्श कर नभ मेघा घनघोर।।०१।।

तरुवर में नवरंग, अंग महका है पावस संग।
मनभावन बरसात, सुवासित होता सारा अंग।।
उर में जगता प्रेम, चराचर सारे होते दंग।
प्रियवर जिसके दूर, करे मन उसका हृद से जंग।।
मेघों को नभ देख, नाचने लगता है वन मोर।
जन-जन में अति हर्ष, दर्श कर नभ मेघा घनघोर।।०२।।

वृक्ष-लताएँ झूम, नृत्य दिखलाते रहते रोज़।
पशु-पक्षी हर जीव, करें जैसे प्रियतम की खोज।।
चूनर धानी ओढ़, धरा है करती नव शृंगार।
हरितिम धारे रूप, अनूप लगे जब गिरे फुहार।।
पल में लगता शाम, कभी लगता जैसे हो भोर।
जन-जन में अति हर्ष, दर्श कर नभ मेघा घनघोर।।०३।।


— राम किशोर पाठक
(प्रधान शिक्षक, सियारामपुर, पालीगंज, पटना, बिहार)


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