जिसके लिए खड़ा हूँ मैं साग़र लिए हुए,
मेरी तलाश करता है ख़ंजर लिए हुए।
तूफ़ान-ए-ज़ुल्म-ओ-जौर से टकरा गया हूँ मैं,
होठों पे तिशनगी का समुन्दर लिए हुए।
अहले-ख़िरद ज़माना जिसे कह रहा है आज,
वो ही खड़ा है हाथ में पत्थर लिए हुए।
जिसका वजूद कुछ नहीं नज़रों के सामने,
पत्थर की शक्ल में है वो गौहर लिए हुए।
ऐ बादशाहो! तुम ये सबक़ भूलते हो क्यों,
दुनिया से क्या गया है सिकंदर लिए हुए?
- सूरज तिवारी
भदोही
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