झूमती हूँ,
लहराती हूँ,
मस्त-मगन होकर मैं बावरी-सी,
ख्वाबों के तिनकों से,
नए आशियाने सजाती हूँ।
कभी इधर बहती,
कभी उधर मुड़ती,
मैं नदी-सी बलखाती,
सागर से मिलने की धुन में,
उसकी ओर खिंची जाती हूँ।
करती हूँ अठखेलियाँ,
भौरों संग गुनगुनाती हूँ,
रंग-बिरंगे पंख फैलाकर,
कभी तितली बन उड़ जाती हूँ।
आँखों में लेकर सपनों की मशालें,
हर मुश्किल राह से लड़ जाती हूँ,
थककर रुकना मेरे मिज़ाज में नहीं,
मैं चलती हूँ, बस चलती ही जाती हूँ...
- जया सिंह
बक्सर, बिहार
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छंदमुक्त