हिंदी साहित्य का काल-विभाजन: शुरुआत से आज तक का सफर (साहित्यिक आलेख)


साहित्य किसी भी समाज का संचित प्रतिबिंब होता है। जैसे-जैसे समाज बदलता है, साहित्य की प्रवृत्तियाँ और उसकी भाषा भी बदलती है। हिंदी साहित्य का इतिहास लगभग एक हजार वर्ष पुराना है। इतने लंबे समय के साहित्य को समझने के लिए उसका काल-विभाजन  करना बेहद जरूरी था। यह काम एक दिन में नहीं हुआ, बल्कि अलग-अलग दौर के विद्वानों ने अपने-अपने दृष्टिकोण से इसे व्यवस्थित किया। आइए, शुरुआत से लेकर आज तक के काल-विभाजन के इस सफर को क्रमिक रूप से समझें।

  गार्सा द तासी और शिवसिंह सेंगर 
काल-विभाजन की दिशा में सबसे पहले कदम फ्रांस के विद्वान गार्सा द तासी (1839 ई.) और फिर शिवसिंह सेंगर (1883 ई.) ने बढ़ाए।
                   इन्होंने केवल कवियों का परिचय लिखा और उन्हें वर्णानुक्रम (जैसे 'क' नाम वाले कवि एक साथ, 'श' वाले एक साथ) के हिसाब से रख दिया। इसमें कोई काल-विभाजन या समय सीमा नहीं थी, इसलिए इन्हें इतिहास ग्रंथ न मानकर केवल 'कवि-वृत्त संग्रह' (कवियों की सूची) माना गया।

 डॉ. जॉर्ज ग्रियर्सन (1889 ई.)
हिंदी साहित्य के इतिहास का पहला सच्चा वर्गीकरण करने का श्रेय एक अंग्रेज भाषावैज्ञानिक डॉ. जॉर्ज ग्रियर्सन को जाता है। उन्होंने अपने ग्रंथ 'द मॉडर्न वर्नाक्युलर लिटरेचर ऑफ हिंदुस्तान' में पहली बार कवियों को उनके समय के हिसाब से बांटा।
ग्रियर्सन ने पूरे इतिहास को 11 कालखंडों में विभाजित किया, जिनमें से मुख्य ये थे:
चारण काल (700 ई. से 1300 ई.) - जहाँ से उन्होंने हिंदी की शुरुआत मानी।
15वीं सदी का धार्मिक पुनर्जागरण
जायसी की प्रेम कविता
ब्रज का कृष्ण संप्रदाय
मुगल दरबार
तुलसीदास
रीति काव्य
तुलसीदास के अन्य परवर्ती कवि
18वीं शताब्दी
कंपनी के शासन में हिंदुस्तान
महारानी विक्टोरिया के शासन में हिंदुस्तान
   
                         ग्रियर्सन ने पहली बार भक्ति काल को हिंदी साहित्य का 'स्वर्ण युग' (Golden Age) कहा, जो उनकी बहुत बड़ी देन है। लेकिन उनका यह विभाजन वैज्ञानिक कम और अध्यायों की सूची जैसा ज्यादा लगता था। अध्यायों की संख्या 11 होने के कारण यह बहुत उलझा हुआ था।

 मिश्रबंधु (1913 ई.)
मिश्रबंधु (तीन सगे भाई- गणेशविहारी, श्यामविहारी और शुकदेवविहारी मिश्र) ने अपने विशाल ग्रंथ 'मिश्रबंधु विनोद' में ग्रियर्सन के 11 भागों को समेटकर 5 मुख्य कालों में बांटा और उनके उप-भाग भी किए:

आरंभिक काल (विक्रमी संवत् 700 से 1444)
माध्यमिक काल (विक्रमी संवत् 1445 से 1680)
अलंकृत काल (विक्रमी संवत् 1681 से 1889) - जिसे आज हम रीतिकाल कहते हैं।
परिवर्तन काल (विक्रमी संवत् 1890 से 1925)
वर्तमान काल (विक्रमी संवत् 1926 से अब तक)

                      इन्होंने पहली बार पूरे इतिहास को एक व्यवस्थित ढांचा देने की कोशिश की और समय-सीमा तय की। परंतु इनके काल-विभाजन के पीछे कोई ठोस वैज्ञानिक कारण या साहित्यिक प्रवृत्ति नहीं थी, बस समय के हिसाब से हिस्से कर दिए गए थे।

 आचार्य रामचंद्र शुक्ल (1929 ई.)
हिंदी साहित्य के इतिहास में सबसे मील का पत्थर साबित हुआ आचार्य रामचंद्र शुक्ल का 'हिंदी साहित्य का इतिहास'। शुक्ल जी ने पिछले सभी विभाजनों की कमियों को दूर करते हुए दो बेहद तार्किक आधार चुने:
प्रधान प्रवृत्ति: उस काल में किस तरह का साहित्य सबसे ज्यादा लिखा गया।
ग्रंथों की प्रसिद्धि: उस दौर के कौन से ग्रंथ समाज में सबसे ज्यादा सराहे गए।

शुक्ल जी ने पूरे इतिहास को बहुत ही स्पष्ट रूप से चार भागों (दोहरे नामकरण के साथ) में विभाजित किया, जो आज भी सर्वमान्य है:

आदिकाल (वीरगाथा काल)
संवत् 1050 से 1375 (सन 993 - 1318 ई.)
इस दौर में राजाओं के आश्रय में रहने वाले कवियों ने वीरता और युद्धों का सजीव वर्णन किया (जैसे- पृथ्वीराज रासो)। इसलिए शुक्ल जी ने इसे 'वीरगाथा काल' नाम दिया।

पूर्व-मध्यकाल (भक्तिकाल)
संवत् 1375 से 1700 (सन 1318 - 1643 ई.)
यह हिंदी साहित्य का चरम उत्कर्ष था। इसमें कबीर, जायसी, सूरदास और तुलसीदास जैसे महाकवि हुए और ज्ञान, प्रेम व भक्ति की अविरल धारा बही।

उत्तर-मध्यकाल (रीतिकाल)
संवत् 1700 से 1900 (सन 1643 - 1843 ई.)
इस दौर में कवियों ने राजाओं को रिझाने के लिए लक्षण-ग्रंथ, श्रृंगार, अलंकार और कला-पक्ष पर ज्यादा जोर दिया। बिहारी, घनानंद, भूषण इसके प्रमुख कवि हैं।

आधुनिक काल (गद्य काल)
संवत् 1900 से अब तक (सन 1843 ई. से अब तक)
शुक्ल जी ने इसे 'गद्य काल' इसलिए कहा क्योंकि इस दौर में कविता के साथ-साथ कहानी, उपन्यास, नाटक और निबंध जैसी गद्य विधाओं का अभूतपूर्व विकास हुआ।

 हजारीप्रसाद द्विवेदी और डॉ. नगेंद्र
शुक्ल जी का ढांचा तो अमर रहा, लेकिन बाद के विद्वानों ने उसमें थोड़े तार्किक सुधार किए। 
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी: उन्होंने शुक्ल जी के 'वीरगाथा काल' नाम का विरोध किया, क्योंकि उस दौर में केवल वीरता ही नहीं, बल्कि जैन, सिद्ध और नाथ साहित्य भी लिखा जा रहा था। द्विवेदी जी ने ही इसे 'आदिकाल' नाम दिया, जिसे आज सब स्वीकार करते हैं।

डॉ. रामकुमार वर्मा और डॉ. नगेंद्र: इन्होंने आधुनिक काल को और स्पष्ट रूप से समझने के लिए उसका आंतरिक विभाजन किया, जो आज के समय में हम पढ़ते हैं:
भारतेंदु युग (पुनर्जागरण काल): 1857 से 1900 ई.
द्विवेदी युग (जागरण-सुधार काल): 1900 से 1920 ई.
छायावाद युग: 1920 से 1936 ई.
प्रगतिवाद युग: 1936 से 1943 ई.
प्रयोगवाद / नई कविता: 1943 से आज तक।

हिंदी साहित्य का काल-विभाजन ग्रियर्सन की शुरुआती कड़ियों से शुरू होकर, मिश्रबंधुओं के प्रयासों से गुजरता हुआ, आचार्य रामचंद्र शुक्ल के यहाँ आकर एक वैज्ञानिक सत्य के रूप में स्थापित हुआ। आज जो सर्वमान्य रूप हमारे सामने है, वह आदिकाल, भक्तिकाल, रीतिकाल और आधुनिक काल का है। यह विभाजन महज़ तारीखों का बँटवारा नहीं है, बल्कि यह हमारे बदलते हुए समाज की चेतना और संवेदना का जीवंत नक्शा है।

बोधायन पत्रिका 

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