एकरूपता अक्सर जीवन को नीरस बना देती है। पैंतालीस की उम्र तक आते-आते रमेश का जीवन भी काँच के उस पेपरवेट जैसा हो गया था जो उसकी मेज़ पर रखा रहता था—एक ही जगह पर गोल-गोल घूमता हुआ, पारदर्शी लेकिन बेहद ठंडा। दफ़्तर की घुटन भरी हवा में फाइलों की गंध के अलावा कुछ नहीं था।
पच्चीस साल की नौकरी में घर जाना अब किसी उत्सव जैसा नहीं, बल्कि एक थका देने वाली ड्यूटी बन गया था। उसकी पत्नी शालिनी, जो एक समय खूबसूरती की मिसाल मानी जाती थी... आँगन में लगे अमलतास की ख़ुशबू देखकर रमेश को हमेशा लगता था कि शालिनी से वही ख़ुशबू आ रही है। आज उसकी आँखों की चमक वक़्त की गर्द में खो चुकी है—घर की जिम्मेदारियों ने उसका कायाकल्प कर दिया है। दोनों के बीच की बातचीत अब केवल 'बिजली के बिल' या 'दवाइयों के पर्चों' तक रह गई है। उनके आँगन में लगा अमलतास का वह पुराना पेड़ भी बरसों से सूखा खड़ा है, मानो उनके रिश्ते की गवाही दे रहा हो।
उम्र के दरवाजे पर पतझड़ आकर खड़ा था कि तभी एक दिन दफ़्तर में सावन की पहली फुहार की तरह किसी का प्रवेश हुआ।
रमेश ने सिर उठाया। ठीक पच्चीस-छब्बीस साल की एक लड़की। आँखों में गज़ब की चमक, माथे पर बेतरतीब सी लट और चेहरे पर वो बेपरवाह चंचलता जो उसकी बेफ़िक्री की बयानी कर रहे थे। अन्वेषा की आवाज़ में एक अजीब सी खनक थी जो सीधे रमेश के उदास सीने में संगीत की तरह बज उठी।
दिन बीतने लगे। रमेश, जो कभी समय से पहले दफ़्तर छोड़ देता था, अब देर तक रुकने के बहाने ढूंढने लगा। अब चारों तरफ़ उसे सितार बजते लगते थे। दबी हुई इच्छाएं करवट लेने लगीं। अब हँसती हुई अन्वेषा के गालों पर पड़ने वाले छोटे से गड्ढे रमेश को बेचैन करने लगे। उसके भीतर का बुझ चुका कोयला फिर से दहक उठा है। वह आईने के सामने ज़्यादा वक़्त बिताने लगा, बालों की कनपटी पर झलकी सफेदी को करीने से छुपाने की कोशिश करने लगा। वह अपनी उम्र भूल रहा था।
एक दोपहर, बाहर झमाझम बारिश हो रही थी। अन्वेषा रमेश के केबिन में आई। अचानक बादलों के गरजने की ज़ोरदार आवाज़ हुई। बिजली ऐसी कड़की कि अन्वेषा डरकर पीछे हटी, उसने झटके से अपनी आँखें मूँद लीं और अपनी सतरंगी चुन्नी के कोने को मुट्ठी में भींच लिया।
रमेश के हाथ की कलम जहाँ की तहाँ रुक गई। उसकी आँखें अन्वेषा को देख रही थीं, लेकिन उसका दिमाग़ समय के किसी बंद दरवाज़े को झटके से खोलकर बाईस साल पीछे चला गया।
...वह ठीक ऐसी ही एक बारिश की दोपहर थी। नई-नई शादी हुई थी। शालिनी, जो गाँव के एक सीधे-सादे परिवार से आई थी, बिजली कड़कने पर ऐसे ही आँखें बंद करके रमेश की कमीज़ का कोना मुट्ठी में दबा लेती थी। तब वह कितनी अल्हड़ और मासूम थी!
अन्वेषा ने आँखें खोलीं और हँसते हुए अपनी भीगी हुई नाक को उंगली से सिकोड़ा।
रमेश के दिल की धड़कन रुकते-रुकते बची। यह आदत... यह ठीक वैसी ही थी जैसी शालिनी की हुआ करती थी जब वह रसोई में काम करते हुए अपनी नाक सिकोड़ती थी।
अगले कुछ हफ़्तों में रमेश के लिए एक अनोखा खेल शुरू हो गया। वह अन्वेषा के करीब जाने की जितनी कोशिश करता, उतना ही शालिनी के अतीत में धँसता जाता।
जब अन्वेषा पेन खो जाने पर बच्चों की तरह पैर पटकती, रमेश को याद आता कि कैसे शालिनी अपनी पसंदीदा झुमका खो जाने पर दो दिन तक रोई थी। जब अन्वेषा दफ़्तर की मेज़ पर रखे पानी के गिलास से खेलती, रमेश को याद आता कि कैसे शालिनी पहली बार शहर आकर नल के बहते पानी को अचरज से देखती थी।
अन्वेषा के हर बचपने में, उसकी हर मासूम चंचलता में, रमेश वास्तव में अपनी शालिनी का वह अक्स देख रहा था जिसे उसने खुद गृहस्थी के बोझ तले कुचल दिया था।
उसे अब रात-दिन याद आता कि शालिनी कितनी भोली थी और वो कितना महत्वाकांक्षी था। उसे शहर में घर, गाड़ी और स्टेटस चाहिए था; शालिनी को तो बस रमेश चाहिए था। सपनों का पीछा करते रमेश ने अपने पीछे दौड़ती-भागती शालिनी की मासूमियत को भी खो दिया।
एक दिन अन्वेषा ने काम करते हुए सहजता से कहा, "सर, आप बहुत अच्छे हैं। काश मुझे भी ज़िंदगी में आपके जैसा ही कोई समझने वाला इंसान मिले।"
रमेश का दिल ज़ोर से धड़का। सच तो यह था कि वो खुद महीनों से अन्वेषा की ख़ुशबू में मदहोश हुआ जा रहा था। अब उसने निर्णय लिया कि यही वह हसीन मोड़ है। अब देर नहीं करनी चाहिए। वह कल अन्वेषा को अपने दिल की बात कह देगा।
अगली शाम, रमेश ने दफ़्तर से निकलते वक्त अन्वेषा को कैफ़े चलने के लिए आमंत्रित किया और वो सहजता से मान गई। दोनों एकसाथ कैफ़े पहुँचे। कैफ़े की मद्धम रोशनी में अन्वेषा बहुत प्यारी लग रही थी। रमेश की एकटक निहारती आँखों से अन्वेषा असहज महसूस करने लगी। बात बदलने के लिए उसने मेन्यू देखते हुए कहा—
"सर! आप क्या लेंगे?"
रमेश ने उसे मुस्कुराते हुए देखा, तभी अन्वेषा ने मेन्यू कार्ड देखते हुए अपनी जीभ दाँतों के नीचे दबाई और अपनी उँगलियों को आपस में फंसाकर मटकाने लगी। वह ठीक वैसे ही बातें कर रही थी जैसे बरसों पहले शालिनी तब करती थी जब वह किसी बात पर शरमा जाती थी।
रमेश के शब्द उसके गले में ही जम गए। उसने अन्वेषा के चेहरे को देखा। उस चेहरे के पीछे उसे अन्वेषा नहीं, बल्कि शालिनी का वह चेहरा दिखाई दिया जो आज सुबह उसे दफ़्तर भेजते वक्त चाय की केतली पकड़े हुए सूनी आँखों से मुस्कुराई थी।
रमेश को अचानक एक बेहद गहरा अहसास हुआ। वह अन्वेषा से प्यार नहीं कर रहा था। वह तो उस 'बचपने' और 'मासूमियत' से प्यार कर रहा था जो कभी शालिनी के पास थी, और जिसे लौटाने की ज़िम्मेदारी उसकी खुद की थी। वह अपनी ही पत्नी के अतीत का पीछा एक दूसरी लड़की में कर रहा था!
"सर? आपने कुछ कहा नहीं?" अन्वेषा ने टोकते हुए पूछा।
रमेश के चेहरे पर एक शांत, पवित्र मुस्कान तैर गई। उसने अपनी जेब से पेन निकाला और पेपरवेट की तरह कैफ़े के बिल पर धीरे से घुमाते हुए कहा, "कुछ नहीं अन्वेषा... बस यह कहना था कि तुम बहुत प्यारी बच्ची हो। बिल्कुल मेरी शालू जैसी।"
अन्वेषा अचरज से देखती रह गई। रमेश उठा, उसने नज़रें झुकाकर कहा, "तुम बुरा मत मानना। मैं भूल गया था। मुझे आज घर जल्दी जाना है। शालू मेरा इंतज़ार कर रही होगी।"
वह बिना उसका उत्तर सुने तुरंत कैफ़े से बाहर आ गया। आज अचानक उसे हवाओं में हर तरफ़ अमलतास की ख़ुशबू आने लगी।
रमेश ने बाज़ार से अमलतास का एक पौधा खरीदा और शालिनी की पसंदीदा मिठाई काजू की बर्फ़ी। घर का दरवाज़ा हमेशा की तरह शालिनी ने ही खोला। उसके चेहरे पर रोज़ की तरह थकान थी। उसने रमेश के हाथों में अमलतास का पौधा और मिठाई का डिब्बा देखा तो वह वहीं ठिठक गई।
"यह... यह क्या है?" शालिनी की आवाज़ में ठीक वही थरथराहट थी जो शादी की पहली रात थी।
रमेश ने आगे बढ़कर शालिनी के उम्रदराज़ और थके हुए हाथों को अपनी हथेलियों में समेट लिया। उसने शालिनी की सूनी आँखों में सीधे देखते हुए कहा,
"यह अमलतास का पौधा है शालू... हमारे लिए। तुम कहती थी न हमारे आँगन का पेड़ सूख गया है। मुझे माफ़ कर देना, मुझे माफ़ कर देना... इसे लाने में मुझे बहुत साल लग गए।"
रमेश ने देखा, अमलतास का पौधा देखते ही शालिनी की आँखों में वही पच्चीस साल पुरानी चमक आ गई है और उसकी धीमी और मीठी महक पूरे घर में फैल रही है।
- डॉ. प्रीति सुमन
सीतामढ़ी, बिहार
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