​कितने ही रील बनाते हैं!(कविता) - अर्जुन प्रभात



संघर्ष-मार्ग पर साथ न दें,
मरने पर भीड़ जुटाते हैं।
कितने ही कविता लिखते हैं,
कितने ही रील बनाते हैं।।
दुनिया की रीत निराली है,
जीवित नर निपट अकेला है।
जीते-जी साथ न कोई है,
मर जाने पर यह मेला है।
चिंता किसको है दुनिया में,
सब अपने को चमकाते हैं।
कितने ही कविता लिखते हैं,
कितने ही रील बनाते हैं।।
जीवित हो तो अनजाना है,
कोई भी ध्यान न देता है।
मर जाने पर सब टूट पड़ें,
जग सर-आँखों पर लेता है।
उसकी प्रतिमाएँ बनती हैं,
सब गीत उसी के गाते हैं।
कितने ही कविता लिखते हैं,
कितने ही रील बनाते हैं।।
पल-दो-पल की यह गाथा है,
फिर कौन किसी को याद करे।
इस रंग-बदलती दुनिया में,
फिर कौन कहाँ फरियाद करे।
आँखों से ओझल होते ही,
अपनों को लोग भुलाते हैं।
कितने ही कविता लिखते हैं,
कितने ही रील बनाते हैं।।
जो साथ किसी को देना है,
जीवन में साथ निभाओ तुम।
जीवन में जब संकट आए,
तब अपने हाथ बढ़ाओ तुम।
सच्चे साथी तो वे हैं जो,
जीवन में साथ निभाते हैं।
कितने ही कविता लिखते हैं,
कितने ही रील बनाते हैं।।


- अर्जुन प्रभात
कवि,लेखक,समीक्षक,भाषाशास्त्री

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