तुमको देखूँ तो दिल संभलता कब है,
मेरे लिए वो चाँद निकलता कब है।
उफ़ ये लोग भी ना, लोग ही ठहरे,
देखते हैं कि मेरा हाल बिगड़ता कब है।
अब भी जो दिख रहा है, फ़रेब ही है,
उनके चेहरे से नक़ाब उतरता कब है।
गुज़र जाते हैं वो बगल से अनदेखे से,
मेरी तक़दीर का पहिया बदलता कब है।
इसी उम्मीद ने उस राह पर रखा है,
तेरे दिल में मेरा प्यार उफ़नता कब है।
अभी क़ीमत नहीं मेरी रुसवाई की,
देखते हैं मेरा भाव उछलता कब है।
कमबख़्त कज़ा को साथ लिये चलता हूँ,
मेरा ख़ालिक़ मुझे ढकेलता कब है।
छोड़ देता है मुझको अधमरा करके,
इतने से मेरा ज़ख़्म बहलता कब है।
मैंने दरवाज़े पर 'राणा' लिखा दिया है,
देखते हैं उसका कुंडा खटकता कब है।
- ई. राणा ब्रजेश
दरभंगा, बिहार
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