“शाबाश बेटे!” मुँह में लड्डू डालते जयंत ख़ुशी से फूले नहीं समा रहे थे।
“रीमा फ़ोन देना, पिताजी को ख़ुशख़बरी देता हूँ कि उनकी पोती शहर के सबसे प्रसिद्ध गर्ल्स कॉन्वेंट में मैथ्स की टीचर नियुक्त हुई है।”
“कब से जॉइनिंग है मनु?” जयंत को फ़ोन देती रीमा ने पूछा।
“मम्मी फर्स्ट से, ठीक सात बजे मदर डेयरी के पास बस स्टॉप पर बस आ जाएगी।”
“ठीक है, फिर फर्स्ट से रोज़ सुबह की चाय और रात की चपाती बनाना तुम्हारी ज़िम्मेदारी।”
“यह क्या मम्मी! खुश होने, शाबाशी देने की बजाय आप मुझे काम बता रही हो,” तुनकती हुई मनु अपने कमरे की तरफ़ बढ़ी...
धड़ाम! दरवाज़ा बंद।
“रीमा यह क्या यार, जॉब करेगी या चाय-चपाती बनाएगी?”
“क्यों, भारत की 90% कामकाजी औरतें जॉब से लौटकर फिर दोबारा घर के काम में लग जाती हैं, तो तुम्हारी बेटी कोई अनोखी है?”
“यहाँ तो आराम करने दो।”
“गर्मी हो, सर्दी हो, मन हो या ना हो, घर के काम से कोई छुट्टी नहीं होती। इसमें ससुराल या मायके का कोई अंतर नहीं। लोग ऐसे ही सास को बदनाम करते हैं। क्या इसके बच्चे नहीं चाहेंगे यह उनका काम करे, खाना बनाए? हाउस हेल्प हो तो अच्छा है पर ना हो तो काम तो आना चाहिए।”
“मैं माँ हूँ, हर इम्तिहान की तैयारी करवाना मेरा फ़र्ज़ है। जब जीवन के समुद्र में उतरे तो गोता ना खाए, लहर जैसी भी हो यह तैर सके।”
“और तुम, तुम्हें ज़्यादा खी-खी करने की ज़रूरत नहीं, कॉलेज पूरा कर तुम भी किचन का काम सीखोगे,” फ़ोन में आँखें जमाए पर कान बातों में लगाए, रोहन के सिर पर टपली देते हुए रीमा ने कहा, “घर के काम करने में कैसी परेशानी? घर जब सबका है, तो काम भी सबका है।”
बाहर की बातें सुन मनु भी कमरे से बाहर आ गई, “अच्छा, कौन-कौन चाय पीएगा?”
- शिवानी खन्ना
दिल्ली
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