रस की परिभाषा और मूल अवधारणा , भाग - एक (साहित्यिक आलेख)

संस्कृत में रस के विषय में दो बातें प्रमुखता से कही गई हैं:
"रस्यते आस्वाद्यते इति रसः" अर्थात जिसका आस्वादन किया जा सके, वही रस है।
"रसयति इति रसः" अर्थात जो आनंद प्रदान करे, वही रस है।
काव्य को पढ़ने, सुनने या नाटक को देखने से जो अलौकिक आनंद प्राप्त होता है, उसे ही काव्यशास्त्र में 'रस' कहा गया है। उपनिषदों में तो रस को परमात्मा का रूप माना गया है— "रसो वै सः" (वह परमात्मा ही रस स्वरूप है)।

  परिभाषाएँ : 

साहित्यशास्त्र में रस को काव्य की आत्मा घोषित करने के लिए विद्वानों ने कई अमर सूत्र दिए हैं:

आचार्य विश्वनाथ (साहित्य दर्पण):
"वाक्यं रसात्मकं काव्यम्"
अर्थात: रसयुक्त वाक्य ही काव्य है। (यह सबसे प्रसिद्ध और अकादमिक रूप से स्वीकृत परिभाषा है)।
आचार्य भामह और दंडी: इन्होंने अलंकार को प्रधान माना था, लेकिन रस की महत्ता को नकारा नहीं।

आचार्य जगन्नाथ (रसगंगाधर):
"रमणीयार्थ प्रतिपादकः शब्दः काव्यम्"
अर्थात: सुंदर या रमणीय अर्थ का प्रतिपादन करने वाला शब्द ही काव्य है (और वह रमणीयता रस से ही आती है)।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल :
"जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञानदशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की मुक्तावस्था रसदशा कहलाती है। हृदय की इसी मुक्ति साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द-विधान करती आई है, उसे कविता कहते हैं।"

आचार्य भरतमुनि : 
रस सिद्धांत के आदि प्रवर्तक आचार्य भरतमुनि (दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व) माने जाते हैं। उन्होंने अपने महान ग्रंथ 'नाट्यशास्त्र' में रस की निष्पत्ति के लिए एक कालजयी सूत्र दिया, जिसे 'रस-सूत्र' कहा जाता है:

अर्थात: विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी (संचारी) भाव के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है।

भरतमुनि ने सूत्र तो दे दिया, लेकिन उन्होंने इस सूत्र में दो शब्दों को स्पष्ट नहीं किया— 'संयोग' और 'निष्पत्ति'। इन दोनों शब्दों की व्याख्या करने के लिए आगे चलकर चार महान आचार्य सामने आए :

'संयोग' का अर्थ / 'निष्पत्ति' का अर्थ

1. भट्ट लोल्लट/ उत्पत्तिवाद / आरोपवादमीमांसा दर्शनउत्पाद्य-उत्पादक संबंधउत्पत्ति (पैदा होना)
2. शंकुक/ अनुमितिवादन्याय दर्शनअनुमाप्य-अनुमापक संबंधअनुमिति (अनुमान लगाना)
3. भट्ट नायक/ भुक्तिवाद / भोगवादसांख्य दर्शनभोज्य-भोजक संबंधभुक्ति (भोग/आस्वादन)
4. अभिनवगुप्त/ अभिव्यक्तिवाद / शैव दर्शनव्यंग्य-व्यंजक संबंधअभिव्यक्ति (प्रकट होना)

अभिनवगुप्त का 'अभिव्यक्तिवाद' सबसे महत्वपूर्ण और सर्वमान्य है। इन्होंने ही 'साधारणीकरण' (जब पाठक या दर्शक काव्य के पात्रों के साथ पूरी तरह तादात्म्य स्थापित कर लेता है) की प्रक्रिया को सुदृढ़ किया, जिसकी नींव भट्ट नायक ने रखी थी।

रस सिद्धांत के विकास को हम चार मुख्य चरणों (युगों) में बांटकर बहुत आसानी और प्रामाणिकता के साथ समझ सकते हैं।

आदि काल (प्रवर्तक युग) - ईसा पूर्व से दूसरी शताब्दी

1. आचार्य भरतमुनि (दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व / दूसरी शताब्दी ई.)
अवदान: ये रस सिद्धांत के मूल प्रवर्तक हैं। इन्होंने अपने ग्रंथ 'नाट्यशास्त्र' में प्रसिद्ध रस-सूत्र (विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः) दिया।
विशेष: इन्होने केवल 8 रसों की प्रतिष्ठा की (शांत रस को शामिल नहीं किया) और रस का विवेचन मुख्यतः 'नाट्य' (नाटक) के संदर्भ में किया।

 व्याख्याकार युग  9वीं से 11वीं शताब्दी
भरतमुनि के बाद रस सिद्धांत पर सबसे बड़ा काम उनके रस-सूत्र की व्याख्या करने वाले इन चार आचार्यों ने किया। 

 भट्ट लोल्लट (9वीं शताब्दी का पूर्वार्ध)
सिद्धांत: उत्पत्तिवाद या आरोपवाद (मीमांसा दर्शन पर आधारित)।
 इन्होंने माना कि रस मूल पात्र (जैसे राम) में उत्पन्न होता है और नट (अभिनेता) पर उसका आरोप कर दिया जाता है।

 आचार्य शंकुक (9वीं शताब्दी का उत्तरार्ध)
सिद्धांत: अनुमितिवाद (न्याय दर्शन पर आधारित)।
             इन्होंने 'चित्र-तुरंग न्याय' (जैसे चित्र में बने घोड़े को देखकर असली घोड़े का अनुमान लगाना) के आधार पर माना कि दर्शक अभिनेता में ही रस का अनुमान कर लेता है।

 भट्ट नायक (10वीं शताब्दी)
सिद्धांत: भुक्तिवाद या भोगवाद (सांख्य दर्शन पर आधारित)।
                                                     रस सिद्धांत के इतिहास में इनका सबसे बड़ा योगदान 'साधारणीकरण' (Generalization) की अवधारणा देना है। इन्होंने माना कि रस न तो उत्पन्न होता है, न अनुमान होता है, बल्कि उसका 'भोग' (आस्वादन) होता है।

 आचार्य अभिनवगुप्त (11वीं शताब्दी का पूर्वार्ध)
सिद्धांत: अभिव्यक्तिवाद (शैव/प्रत्यभिज्ञा दर्शन पर आधारित)।
              रस सिद्धांत को चरम उत्कर्ष पर पहुँचाने वाले यही आचार्य हैं। इन्होंने साधारणीकरण को पूर्णता दी और शांत रस को नौवां रस (नवरस) मानकर उसे अकादमिक प्रतिष्ठा दिलाई। इनका मत आज भी सर्वमान्य है।

उत्तर-मध्य काल (विस्तार और भक्ति युग) - 12वीं से 17वीं शताब्दी

इस दौर में रस का विस्तार नाटक से निकलकर पूरी तरह काव्य में हुआ और नए रसों को मान्यता मिली:

आचार्य मम्मट (11वीं-12वीं शताब्दी)
ग्रंथ: 'काव्यप्रकाश'।
                               इन्हें 'ध्वनिवादी' आचार्य माना जाता है, लेकिन इन्होंने रस को ध्वनि का ही एक भेद (असंलक्ष्यक्रम व्यंग्य ध्वनि) मानकर रस सिद्धांत को नया तार्किक आधार दिया।

आचार्य विश्वनाथ (14वीं शताब्दी)
ग्रंथ: 'साहित्य दर्पण'।
                  इन्होंने अपना अमर सूत्र "वाक्यं रसात्मकं काव्यम्" दिया। इसके अलावा, इन्होंने 'वात्सल्य रस' को हिंदी/संस्कृत साहित्य में 10वें रस के रूप में स्थापित किया।

रूप गोस्वामी (16वीं शताब्दी)
ग्रंथ: 'भक्तिरसामृतसिंधु' और 'उज्ज्वलनीलमणि'।
                  इन्होंने चैतन्य महाप्रभु की भक्ति परंपरा के तहत 'भक्ति रस' (मधुर रस) को 11वें रस के रूप में पूर्ण शास्त्रीय मान्यता दी।

 पंडितराज जगन्नाथ (17वीं शताब्दी)
ग्रंथ: 'रसगंगाधर'।
             संस्कृत काव्यशास्त्र के अंतिम महान आचार्य। इन्होंने रस के स्वरूप को 'रमणीयार्थ प्रतिपादकः' कहकर परिभाषित किया और रस के आस्वादन को 'लोकोत्तर चमत्कार' माना।

 रीतिकाल और आधुनिक काल (हिंदी के आचार्य) - 18वीं से 20वीं शताब्दी

संस्कृत के बाद जब हिंदी साहित्य में रस पर बात हुई, तो ये नाम सबसे प्रमुख हैं:
रीतिकाल के कवि-आचार्य (चिंतामणि, देव, भिखारीदास - 17वीं-18वीं सदी)
                  इन आचार्यों ने संस्कृत के रस-सिद्धांतों का ब्रजभाषा में अनुवाद किया और राजाओं को समझाने के लिए श्रृंगार रस पर सबसे ज्यादा जोर दिया। देव ने 34वां संचारी भाव 'छल' माना था।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल (20वीं शताब्दी)
               इन्होंने रस सिद्धांत को पूरी तरह लोक-मंगल से जोड़ दिया। शुक्ल जी ने रस को केवल व्यक्तिगत आनंद नहीं माना, बल्कि उसे 'हृदय की मुक्तावस्था' कहा, जहाँ मनुष्य का अहंकार गल जाता है और वह पूरे समाज के सुख-दुख से जुड़ जाता है।

 रस के चार अंग (अवयव)
रस-सूत्र के आधार पर रस के चार प्रमुख अंग स्वीकार किए गए हैं:

क. स्थायी भाव
मनुष्य के हृदय में जो भाव सुप्त अवस्था में हमेशा विद्यमान रहते हैं और अनुकूल वातावरण पाते ही जाग्रत हो जाते हैं, उन्हें स्थायी भाव कहते हैं। मूलतः इनकी संख्या 9 मानी गई थी (इसीलिए 'नवरस' कहा जाता है), लेकिन बाद में वात्सल्य और भक्ति को मिलाकर इनकी संख्या 11 हो गई।

ख. विभाव
स्थायी भावों को जगाने वाले (उद्दीप्त करने वाले) कारण या साधन को 'विभाव' कहते हैं। इसके दो भेद हैं:

आलंबन विभाव: जिसके कारण भाव जगे (जैसे नायक के मन में नायिका को देखकर भाव जगे, तो नायिका आलंबन है)। इसमें दो पक्ष होते हैं— आश्रय (जिसके मन में भाव जगे) और विषय (जिसके प्रति भाव जगे)।

उद्दीपन विभाव: वह बाहरी वातावरण या चेष्टाएँ जो जगे हुए भाव को और तीव्र कर दें (जैसे कोयल का कूकना, चाँदनी रात, एकांत स्थान)।

ग. अनुभाव
भाव जाग्रत होने पर आश्रय के शरीर में जो बाहरी चेष्टाएँ दिखाई देती हैं, उन्हें अनुभाव कहते हैं (जैसे डर के मारे काँपना, पसीना आना, आँखों से आँसू बहना)। ये मुख्यतः चार प्रकार के होते हैं: आंगिक/काविक (शरीर की हरकत), वाचिक (वचन), आहार्य (वेशभूषा) और सात्विक (जो स्वतः उत्पन्न होते हैं, जैसे कंपकंपी या अश्रु)।

घ. संचारी या व्यभिचारी भाव
ये वे भाव हैं जो स्थायी भाव के साथ-साथ पानी के बुलबुलों की तरह उठते और विलीन होते रहते हैं। इनकी संख्या 33 मानी गई है (जैसे हर्ष, शंका, चिंता, मोह, गर्व आदि)।


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