बड़ी मिन्नत और मन्नतों के बाद रिंकू के बथान वाले केले के पेड़ में इस बार जो घवद (केले का गुच्छा) लगा था, वह पूरे टोले में चर्चा का विषय था। केले इतने लंबे और सुडौल थे जैसे साक्षात सोने की उंगलियां लटक रही हों। वह घवद, बाउंड्री की पतली सी फूस की टाटी को पार कर सड़क की तरफ झुक आया था।
शादी के दो साल बाद जब बबली अपने मायके लौटी, तो बचपन की सहेली रिंकू उसे देखते ही दौड़ पड़ी, "अरे बबली! कितने दिन बाद आई रे। चल, बैठ के बतियाते हैं।"
"घर में सब बूढ़े-बुजुर्ग हैं, यहाँ खुल के बात नहीं होगी। चल, पीछे बागीचे में बैठते हैं," रिंकू ने बबली का हाथ पकड़ा और बागीचे की तरफ खींच ले गई।
बागीचे में कदम रखते ही बबली की नज़र उस भारी-भरकम केले के घवद पर पड़ी। वह चकित होकर बोली, "अरे रिंकू! ई केला तो एकदम पकने पर आ गया है, इतना बड़ा-बड़ा! इसको काट क्यों नहीं लेती?"
रिंकू ने गर्व से दुपट्टा लहराया, "अरे अभी कहाँ? अभी थोड़ा और गदराएगा, तब काटेंगे।"
बबली ने सड़क की तरफ झाँकते हुए मज़ाकिया लहजे में आँख मारी, "अरे पगली, टाटी के उस पार लटका हुआ है। ज़माना ख़राब है, रात-बिरात कोई उड़ा ले जाएगा तब?"
"धत! अपने टोले में कोई ऐसा चोर-चोट्टा नहीं है," रिंकू ने कहा।
बबली खिलखिलाकर हँसी, "अच्छा! अगर मैं यहाँ रहती न, तो सच कहती हूँ, रात को मैं ही आकर साफ़ कर देती! इतना सुंदर केला देखकर तो मेरा ही जी ललचा रहा है।"
रिंकू ने उसे हल्के से कुहनी मारी, "चल हट चोरनी कहीं की! कुछ भी बोलती है।"
दोनों हँसते-खेलते घर लौट आईं, लेकिन टाटी के दूसरी तरफ से कान लगाए गुज़र रही पड़ोस की 'सुखिया काकी' ने यह सब सुन लिया। उनके पेट में कोई बात पचती कहाँ थी!
होनी का खेल देखिए, उसी रात सचमुच चोरों ने धावा बोला और आधा केला काट ले गए। सुबह जब शोर मचा, तो सुखिया काकी ने तुरंत नमक-मिर्च लगाकर पूरे टोले में ढिंढोरा पीट दिया, "अरे, और कौन काटेगा! कल ही बबली कह रही थी कि वो होती तो चुरा लेती। लो, रात को गायब हो गया!"
बात आग की तरह फैली और रिंकू के कानों तक भी पहुँची।
अब यहाँ से ग़लतफ़हमी का एक अजीब चक्रव्यूह शुरू हुआ। रिंकू का दिल रो रहा था। वह मन ही मन सोच रही थी, "मैं तो जानती हूँ बबली कितनी पगली है। कुछ भी, कहीं भी बोल देती है। उसने तो सब हँसी मजाक में कहा था और मैंने तो यह बात किसी को बताई भी नहीं, फिर पूरे गाँव में कैसे फैल गई! बबली को यही लग रहा होगा कि मैंने उसका भरोसा तोड़कर यह बात सबको बताई। मैं किस मुंह से उसके सामने जाऊँ?"
इसी संकोच और ग्लानि में रिंकू बबली से नज़रें चुराती रही, बचती रही। यहाँ तक कि बबली की ससुराल जाने का दिन भी आ गया। पूरे टोले की औरतें बबली से मिलने पहुँचीं, लेकिन रिंकू अपने घर के ओसारे में उदास बैठी रही। उसके कदम उठ ही नहीं रहे थे।
तभी अचानक एक साया रिंकू के सामने आकर खड़ा हो गया। रिंकू ने चौंककर देखा—सजी-धजी बबली खड़ी थी।
रिंकू ने रुआंसे होकर नज़रें झुका लीं, "बबली... तू?"
बबली ने आगे बढ़कर सीधे रिंकू को गले से लगा लिया और प्यार से झिड़कते हुए कहा, "पगली कहीं की! तू क्या मन ही मन सोचे जा रही है? तूने क्या सच में मुझे चोरनी मान लिया जो मुझसे मिलने भी नहीं आई?"
रिंकू की आँखों से सावन-भादो बह निकले। वह बबली को भींचते हुए बोली, "नहीं रे बबली! भगवान कसम, मैंने तुम पर रत्ती भर शक नहीं किया। मैं तो जानती हूँ तू कैसी है। पर गाँव में जो बात फैली... मुझे लगा तू सोचेगी कि यह बात मैंने फैलाई है। मैं इसी डर और शर्म से तेरे पास नहीं आ पा रही थी कि तू मेरे बारे में क्या सोच रही होगी!"
बबली ने मुस्कुराकर रिंकू के आँसू पोंछे और हंसते हुए कहा, "धत पगली! मुझे पता था कि मेरी रिंकू ऐसा नहीं कर सकती। वह तो उस सुखिया काकी की ज़ुबान कतरनी जैसी चलती है, उन्होंने ही हमारी बात सुन ली और पूरे गाँव में फैला दी।"
फिर बबली ने थोड़ा कड़वा मुंह बनाकर बागीचे की तरफ देखा और बोली, "वैसे एक बात बता, थोड़ा ध्यान से पता तो करती! हमारे ससुराल तक को पता है कि तुम्हारे यहाँ चोरी किसने की, और तुम दोनों माँ-बेटी पूरे गाँव में रोती फिर रही हो!"
रिंकू ने अचरज से पूछा, "कौन? किसने काटा केला?"
बबली ने अपनी पोटली संभालते हुए चुटकी ली, "अरे वही मंगरूआ! जो पैदा ही टोले भर की चीज़ें उड़ाने के लिए हुआ है। शक करना था तो उस नामी चोर पर करतीं, चली थी अपनी सहेली को चोरनी समझने!"
यह सुनते ही रिंकू का सारा रोना गायब हो गया और वह खिलखिलाकर हँस पड़ी। दोनों सहेलियाँ एक बार फिर बचपन की तरह एक-दूसरे के गले लग गईं। ग़लतफ़हमी का जो कोहरा दो दिनों से छाया था, वह दोनों के अटूट विश्वास की धूप में पूरी तरह छँट चुका था।
- डॉ. प्रीति सुमन
सीतामढ़ी, बिहार
Tags
कहानी