सवालिया आँखें(कहानी)— भगवती प्रसाद द्विवेदी

'जागो ब्रजराज कुँवर, भोर भई!' बाबूजी का चिर-परिचित आलाप कानों में गूँजते ही वह जमुहाई लेता हुआ उठ बैठा। सबसे पहले ओसारे में से नज़रें अपने आप सामने खलिहान में खड़े बुढ़वा पीपल के पेड़ पर जा अटकीं। तमाम पत्तियों का बेहिचक ताबड़तोड़ डोलना और गिद्धों के झुंड का चिल्ल-पों मचाना जारी हो गया था। आज भी वह बुढ़वा पेड़ खामोश खड़ा था। बरसों पहले एक रात अचानक उस पर बिजली गिर पड़ी थी। मगर वह ऊपर से ठूँठ होकर भी 'हम टूट सकते हैं, मगर झुक नहीं सकते' की मुद्रा में गर्दन उठाए खड़ा था—एक अपाहिज सिपाही की मानिंद। उस मरियल पेड़ की तुलना में वह खुद कितना झुका-टूटा, गाँव के लोग कितने झुके-उठे और कितने ज़िंदगी की स्याह अँधियारी में एकाएक कहीं लुप्त हो गए—सभी कुछ उसकी आँखों की सीढ़ियों पर आहिस्ता-आहिस्ता चढ़ने को हुआ। तभी उसने गर्दन घुमाकर सिर को एक झटका दिया—धत् तेरे की! सुबह-सुबह क्या लेकर उठ गया वह!
"बबुआ, टट्टी-फरागित जाओगे न?" बाबूजी मवेशियों को सानी-पानी गोतकर अब गोबर उठाने लगे थे।
पुनः एक जमुहाई लेकर उसने पूरा बदन उमेठा और पैरों को खटिया से नीचे लटकाकर चप्पलें टटोलने लगा।
दाढ़ी काका अपने दुआर से रट्टू सुग्गे की तरह अपना वही पुराना भजन बार-बार दोहरा रहे थे—'सीताराम गाओ, सीताराम गाओ, मानुस तनवा हइ बड़ा हो मुश्किल है, ...तो सीताराम गाओ...।' अपनी पुरानी आदत के मुताबिक वह खेत से दिशा-मैदान होकर एक खाँची माटी ज़रूर लाए होंगे। जब से वह मिलिट्री से रिटायर होकर हमेशा-हमेशा के लिए गाँव आए, उनकी यह दिनचर्या ही बन गई—दिनभर खेतों से माटी ढोना, दुआर भरना और थक-हार जाने पर गाँव के नवयुवकों के साथ ताश खेलने में मशगूल हो जाना।
रामप्रीत बाबा अब अपनी गाय को नाँद पर से उतारकर दुहने लगे थे और उनकी दूध दुहने की आवाज़ वातावरण पर छा गई थी। एकाएक उसे याद हो आया, जब बाबा से गाँव का कोई आदमी अपनी गाय दुहने को कहता तो वह दुहते-दुहते उसे चिकोटी काट देते, जिससे गाय बिदककर लात मार देती और दुहा-दुहाया दूध धरती पर पसर जाता। अचानक उसके चेहरे पर मुस्कान की प्रातःकालीन लालिमा पसर गई।
सानी-पानी में थुथने डुबोकर मुँह चलाते बैलों की घंटियाँ टुनटुना रही थीं। कौवे 'काँव-काँव' करते हुए यहाँ-वहाँ ऊधम मचा रहे थे। रमेसर चाचा का नन्हका 'उठो लाल, अब आँखें खोलो, पानी लाई हूँ, मुँह धो लो'—वाली कविता चिल्ला-चिल्लाकर याद कर रहा था। सामने ही दियरखे पर धरी हुई ढिबरी अब बुझा दी गई थी। नन्हके पर नज़र पड़ते ही उसे अपना बचपन आँखों के सम्मुख घूर गया। बाबूजी कुट्टी-छपाटी काटने के लिए उठते थे और उसे जगाकर फिर अपनी ही धुन में लवलीन हो जाया करते थे। वह आँखें मलते हुए उठता था और हाथ-मुँह धोकर रटने लगता था—'दिस स्टैंजा हैज बीन टेकन फ्रॉम द पोयम...!' तब गाँव भर में चर्चा का विषय बन गया था—राजेन्दर का लड़का अंग्रेज़ी बोलता है, अंग्रेज़ी में पाठ पढ़ता है, लिखता है! अब तो वह शहर में आठ बजे तक खर्राटे लेता रहता है। पता ही नहीं चलता कि कब भोर हुई, कब मुर्गा बोला और कब पूर्वी क्षितिज पर लालिमा छाई।
खटिया के नीचे पड़ा लोटा उठाकर वह रेलवे लाइन की तरफ बढ़ गया। कुछेक औरतें दिशा-मैदान होकर उधर से लौट रही थीं। कुछेक लोटा लिए हुए, मगर अधिकांश खाली हाथ। धत् तेरे की! कहाँ मैदान होना और कहाँ पानी छूना! उसे अनायास थुकथुकी बरने लगी। आगे बढ़कर उसने छवर की राह पकड़ ली।
काले-कलूटे लड़कों का एक हुजूम कुलाँचते हुए आया और उसके बगल से होकर सर्र-से गुज़र गया। एक कुनमुनाया भी, "ई के ह रे?"
"होइहन कवनो शहरी बाबू!" दो-तीन लौंडे समवेत स्वर में बोले।
वह उन्हें गौर से देखना चाह रहा था—कौन हैं ये सब? लगता है, पश्चिम टोले के मजदूरों के बेटे हैं। शायद महुआ बीनने जा रहे हैं महुआ बारी में। वह कुछ देर तक अपरिचित निगाहों से उन्हें टुकुर-टुकुर ताकता रहा। फिर आगे बढ़, हाँक लगाकर उनसे कुछ बतियाना भी चाहा। मगर वे तो उसे अजीब नजरों से अचकचाकर देखते रहे। फिर खिलखिलाते हुए नौ दो ग्यारह हो गए। उसे लगा जैसे उसकी खिल्ली उड़ाई जा रही हो।
"पाँव लागू हूँ, भैया!" पीछे से आई आवाज़ पर उसने मुड़कर देखा। भगेलू था। उसके साथ कुछ दिनों तक पढ़ा था। रात में कुट्टी-छपाटी काटकर मवेशियों को खिलाता, सुबह गोबर-पानी करने के बाद भैंस को धोने गढ़े में ले जाता। वहाँ से लौट स्कूल की तैयारी में जुट जाता। क्या पढ़ता-लिखता बेचारा! हाई स्कूल में जब लगातार चार साल तक फेल ही होता रह गया तो घरवालों ने आजिज़ आकर उसकी पढ़ाई छुड़वा दी। डंडों की मार पड़ी, थुक्का-फ़ज़ीहत हुई, सो अलग।
"क्या हाल-चाल है, भगेलू?" वह माहौल की तंद्रा भंग करता है।
"बस, ठीक ही है, भैया!" भगेलू की मरियल आवाज़ उसके कानों में पड़ती है।
"और सब संगी-साथी आजकल कहाँ हैं, भगेलू?" वह जिज्ञासावश पुनः सवाल ठोंकता है।
"दिनेसर, बच्चाजी, गणेश जी, रमाशंकर—सब के सब तो शहर में चले गए, भैया! रोज़ी-रोटी के जुगाड़ में कहीं-न-कहीं तो जाना ही पड़ता है। एक मेरे ही नसीब में नरक भोगना बदा था। खेती में दिन-रात खटो, खून-पसीना बहाओ, फिर भी खाने तक का ठिकाना नहीं। कभी बाढ़, कभी सूखा, तो कभी ओलावृष्टि। मौत का कुँआ है ई खेती।" भगेलू रुआँसा हो, अस्फुट स्वर में निराशा ज़ाहिर करता है।
"सब अपनी-अपनी जगह परेशान हैं, भगेलू! कोई सुखी नहीं है।" उसे दिलासा दिलाने की गरज से वह दार्शनिक-सा मुँह बनाकर कहता है।
"भैया, शहर में कहीं मेरा भी जुगाड़ बैठा देते तो बड़ी मेहरबानी होती। आपका उपकार मैं जीवन भर नहीं भूलूँगा, भैया! मुझको इस नरक से उबार लीजिए।" भगेलू की आँखों से आँसू छलछलाने लगे।
"ज़रा धीरज रख पगले! इस तरह पेशेंस खोओगे तो कैसे काम चलेगा? अबकी बार जाकर मैं पूरी कोशिश करूँगा और जैसी खबर होगी, लिखूँगा।" वह भगेलू को धैर्य बँधाने के लिहाज़ से कहता है। हालाँकि उसे बखूबी पता है कि उसके लिए वह कुछ भी नहीं कर पाएगा।
"अच्छा भैया, चलता हूँ बधार की तरफ। फिर दुआर पर आऊँगा साँझ के वक्त।" भगेलू हाथ जोड़ता है। वह सिर हिलाता है और भगेलू 'चौरासी' खेत की तरफ बढ़ जाता है।
बलेसर बाबा मठिया की तरफ से लौट रहे हैं। वह उनसे पिंड छुड़ाना चाह रहा है। लगेंगे बतियाने तो उनकी बतकही द्रौपदी का चीर बन जाएगी। घर की बातें, गाँव की बातें, शहर की बातें, दुनिया-जहान की बातें। बस बातें ही बातें। वह पूरब वाली पगडंडी पकड़कर आगे बढ़ना चाहता है। तभी बाबा टोक ही बैठते हैं, "अरे बबुआ, तनी हेनिओ सुनिहs!"
आखिर वही हुआ, जिसकी उसे आशंका थी। हालचाल और कुशलक्षेम पूछने के बाद बलेसर बाबा असल बात पर आ गए, "बियाह-मरन कवनो रोज़ थोड़े होला, बबुआ! बबुआ, माई के मुअला में बाल-बच्चन के ना लेअइला हा?"
"क्या करें बाबा! उतने लोगों को लाना, फिर वापस ले जाना। बच्चों की परीक्षा भी है। उस पर यात्रा की भयंकर परेशानी!" उसने रुपये-पैसे वाली असल मुसीबत को जान-बूझकर छिपा लिया।
"आ एगो अउर बात सुननी हाँ, बबुआ! तहार बाबूजी कहत रहन, माई के क्रिया-करम में कुछ ना दिहलs हा?" बाबा ने आखिर वही सवाल ठोंका, जिसका उसे डर था।
"बाबा, शहर में बाल-बच्चों को रखकर परवरिश करना, उनकी पढ़ाई-लिखाई का माकूल इंतज़ाम करना और मकान का किराया देना—बहुत आर्थिक तंगी में हूँ, बाबा!"
उसने महसूस किया, बाबा पर उसकी असमर्थता का कुछ भी असर नहीं हुआ, "बियाह-मरन कवनो रोज़ थोड़े होला, बबुआ!"
"बाबा, यह बात तो है ही, मगर हम भी लाचार हैं। वैसे हर माह कुछ-न-कुछ भेजता ही रहता हूँ। अचानक फोन से सूचना मिली। पैसे थे नहीं। जल्दबाजी में कोई व्यवस्था नहीं कर पाया। खैर, जो कर्ज़ लिया गया है, उसे सूद समेत मुझे ही तो चुकता करना होगा। अच्छा बाबा, चलता हूँ, टट्टी जाना है।" वह ज़बर्दस्ती बलेसर बाबा से पिंड छुड़ाकर उनकी तरफ देखे बगैर ही आगे बढ़ गया।
कब मैदान हुआ, कब वापस लौटा, उसे पता नहीं चला। बलेसर की बातें बार-बार उसके दिमाग़ में घुसकर अपना दखल जमा लेती थीं और वह चाहकर भी उन्हें दिमाग़ से परे नहीं धकेल पाता था। मैं भी किसान का बेटा हूँ। बाबूजी का दर्द मैं समझ सकता हूँ, मगर मेरी परिस्थिति का क्या उन्हें ज़रा भी अहसास नहीं?
लौटते वक्त रास्ते में उससे और कई लोगों ने बातें कीं। दंड-प्रणाम, कुशलक्षेम के बाद फिर माँ की अंत्येष्टि क्रिया और रुपये-पैसे पर आकर बात टिक गई। सबके खोद-खोदकर पूछने पर उसे लगा जैसे सबके सब उसका मखौल उड़ा रहे हों। यहाँ कोई भी अपना नहीं। सब के सब हँसी उड़ाने वाले। सहानुभूति के नाम पर तीखा प्रहार करने वाले। वह कहाँ आ गया है? उसका बरसों पहले वाला गाँव कहाँ गया? वे लोग कहाँ गए? सबके साथ भाईचारा, एक-दूसरे के दुख-दर्द का हँसते-खेलते बँटवारा। उसे लगा जैसे वह अचानक एक ऐसे जंगल में चला आया हो, जहाँ चारों तरफ भेड़ियों का हुजूम हो। वे लोग उसे कोंच-कोंच कर मार डालेंगे।
कुल्ला-कलाली करके वह दुआर पर पड़ी हुई खटिया पर बैठ गया। बाबूजी नहा-धोकर रामायण-पाठ कर रहे थे। उसने उनकी तंद्रा भंग की, "बाबूजी?"
"का बबुआ?" वह उसकी तरफ टुकुर-टुकुर देखने लगे।
"बाबूजी, मैंने आपसे पहले भी कहा था कि मैं वहाँ एक निजी कंपनी में महज़ पंद्रह हज़ार रुपये की किरानीगिरी करता हूँ। उसी में बाल-बच्चों को रखकर पढ़ाना-लिखाना, मकान का रेंट देना, सबकी परवरिश करना, यहाँ भी हर माह कुछ-न-कुछ भेजना। माँ के श्राद्ध में मैं जल्दबाजी में कुछ इंतज़ाम नहीं कर पाया। खैर, आपने खेत को बंधक रखकर रुपये लिए हैं, किसी ने मुफ्त में ही तो दिया नहीं। धीरे-धीरे चुकता कर दूँगा। मगर एक बात मेरी समझ में नहीं आती। इस बात को गाँव भर पटाने की क्या ज़रूरत थी?" उसे लग रहा था जैसे उसके बदन पर पेट्रोल छिड़ककर किसी ने आग लगा दी हो और उसका अस्तित्व धू-धू कर जलने लगा हो।
"बबुआ, जिस आस-हुलास से तुझे तेरी माँ ने अपनी कोख से जनमाया था, उस पर तूने पानी फेर दिया। मैंने खेत ही रेहन नहीं रखा, यही समझो, मेरी माँ किसी के पास बंधक रख दी गई, मेरी बेटी...!" बाबूजी की आँखों में आँसू तैरने लगे।
"बाबूजी!" वह बात काटकर बोला।
"हाँ बबुआ! धरती माँ होती है, बेटी होती है। कोई अपनी माँ-बेटी को बेचना चाहेगा? बंधक रखेगा? इससे तो बेहतर होता, मैं खुद मर गया होता। अगर तू यहाँ नहीं आया होता तो मुझे ज़रा भी दुख नहीं होता। मगर यहाँ खाली हाथ आकर तूने मेरी सारी इज़्ज़त-प्रतिष्ठा खाक में मिला दी। अब मैं गाँव में कैसे मुँह दिखाऊँगा? हे भगवान! मुझे कब उठा रहे हैं ताकि..." _बाबूजी की आँखों से आँसू टपकने लगे, रामायण भीगने लगी। वह बाबूजी को फिर कुछ समझाने ही जा रहा था कि गाँव के दसेक लोगों को अपने पीछे खड़े देखकर अचकचा गया। उनकी सवालिया आँखें उसे बार-बार घूर रही थीं।
तमाशबीन-से जुटे तमाम लोग अब दो भागों में विभक्त होकर तरह-तरह के बेतुके और तीखे सवालों के तीर छोड़ने लगे थे और वह एक असहाय परकटे पंछी की नाईं सबों की तरफ बस टुकुर-टुकुर ताके जा रहा था।

- भगवती प्रसाद द्विवेदी 
सर्जना , सृजनशील कालोनी,
निकट मगध आईटीआई,
नासरीगंज, दानापुर,
पटना- 801 503(बिहार)
ईमेल:dubeybhagwati123@gmail.com




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