देखो जब हम पास नहीं होंगे तेरे जानाँ,
मेरी ग़ज़लें तुम फिर तन्हाई में गाना।
भीगी पलकों से जब मुझको याद करो तुम,
ख़ामोशी में दिल को अपना हाल सुनाना।
रात की यह तन्हाई जब तुझको डस जाए,
यादों की शम्अ फिर तुम धीरे से जलाना।
दुनिया की इस भीड़ में ख़ुद को तन्हा जो पाओ,
मेरे अल्फ़ाज़ों से ही तुम एक गीत बनाना।
पूछे जो कोई तुमसे नम आँखों का यह राज़,
झूठी सी कोई हँसी अपने लब पे सजाना।
बदलेगा जब वक़्त ज़माना भी तब बदलेगा,
तुम अपने उन वादों को तब तक न भुलाना।
जब रस्तों पर मिलती तुमको मेरी निशानी,
छूकर उन यादों को तुम फिर से मुस्काना।
— मनीषा सहाय 'सुमन'
झारखंड
पति:- मनीष सहाय
जन्म तिथी-- 19 सितंबर
शिक्षा:-स्नातकोत्तर त्रय--
(राजनीति शास्त्र, हिंदी, मानव संसाधन)
रूचि:- लेखन, समाज कार्य
अणु डाक- mani09sahay@gmail.com