मलिक मुहम्मद जायसी — प्रेम की पीर के अमर गायक और 'पद्मावत' के महाकवि (कालजयी रचनाकार)

हिंदी साहित्य के भक्तिकाल में जहाँ एक ओर ज्ञान और सगुण भक्ति की धाराएँ बह रही थीं, वहीं दूसरी ओर सूफ़ी संतों ने 'प्रेम' को ईश्वर प्राप्ति का सबसे बड़ा माध्यम माना। इस सूफ़ी या प्रेमाश्रयी काव्यधारा के शीर्ष पुरुष मलिक मुहम्मद जायसी (1477–1542) हैं। जायसी ने इंसानी प्रेम के माध्यम से अलौकिक या ईश्वरीय प्रेम का जो ताना-बाना बुना, वह अद्भुत है। उन्हें साहित्य में 'प्रेम की पीर का कवि' कहा जाता है।

जायसी की कीर्ति का मुख्य आधार उनका अमर महाकाव्य 'पद्मावत' है। चित्तौड़ के राजा रत्नसेन और सिंहल द्वीप की राजकुमारी पद्मावती की इस कथा में जायसी ने इतिहास और लोक-कल्पना को इस तरह पिरोया है कि वह केवल एक राजा-रानी की कहानी नहीं रह जाती, बल्कि आत्मा (रत्नसेन) और परमात्मा (पद्मावती) के मिलन का प्रतीक बन जाती है।

 पंक्तियाँ (नागमती वियोग वर्णन):
पिउ सों कहेहु संदेसड़ा, हे भौंरा हे काग।
सो धनि बिरहें जरि मुई, तेहिक धुआँ हम लाग॥

 भावार्थ: विरह में तड़पती नागमती भौंरे और कौए से कहती है कि मेरे प्रियतम तक यह संदेश पहुँचा देना कि तुम्हारी पत्नी विरह की आग में जलकर राख हो गई है और उसी के जलने से जो काला धुआँ निकला, उससे हमारे पंख भी काले हो गए हैं। वियोग श्रृंगार का ऐसा मर्मस्पर्शी उदाहरण पूरे विश्व साहित्य में दुर्लभ है।

जायसी की सबसे बड़ी विशेषता उनकी भाषा थी। उन्होंने कोई कठिन संस्कृतनिष्ठ भाषा नहीं चुनी, बल्कि अवधी के उस ठेठ ग्रामीण और लोक-स्वरूप को अपनाया जो अवध के आम लोगों के घरों में बोली जाती थी। उनके मुहावरों और लोक-कथाओं के प्रयोग ने 'पद्मावत', 'अखरावट' और 'आखरी कलाम' जैसी रचनाओं को जन-जन के करीब पहुँचा दिया।

जायसी स्वभाव से बेहद उदार सूफ़ी संत थे। उन्होंने भारतीय संस्कृति, वेदों, पुराणों और लोक-मान्यताओं को बहुत गहराई से समझा था। हिंदू राजघराने की पृष्ठभूमि पर महाकाव्य लिखकर उन्होंने समाज में सांस्कृतिक और धार्मिक समन्वय की एक ऐसी अनूठी मिसाल पेश की, जिसकी प्रासंगिकता आज के दौर में और भी बढ़ जाती है।

मलिक मुहम्मद जायसी का साहित्य हमें सिखाता है कि प्रेम ही इस सृष्टि का एकमात्र सत्य है। जब तक हृदय में प्रेम और करुणा की 'पीर' (दर्द) नहीं होगी, तब तक न तो श्रेष्ठ साहित्य का सृजन हो सकता है और न ही मानवता का कल्याण।

साभार और संदर्भ सूची :
स्रोत ग्रंथ: पद्मावत (मूल पाठ, संपादक: आचार्य रामचंद्र शुक्ल)।
ऐतिहासिक संदर्भ: सूफ़ी काव्यधारा और मलिक मुहम्मद जायसी (आलोचनात्मक ग्रंथ)।

विशेष आभार: यह आलेख 'बोधायन पत्रिका' के मंच से प्रेम के अमर शिल्पी मलिक मुहम्मद जायसी के प्रति सादर साभार समर्पित है।

एक टिप्पणी भेजें

और नया पुराने
बोधायन पत्रिका
बोधायन पत्रिका