तुम्हारी योजनाओं के तरीक़े भी निराले हैं,
अंधेरों को अंधेरे हैं उजालों को उजाले हैं।
दवाओं पर करोगे ख़र्च कुछ दिन और जी लोगे,
जो पोते-पोतियों के वास्ते पैसे संभाले हैं।
ये काफ़ी था कि तुम इंसान को इंसान ही कहते,
ये तुमने क्या लगा रक्खा ये गोरे हैं ये काले हैं।
अगर मौक़ा मिला तो दान भी अपना बना लेंगे,
अरे भगवान अपना है कि हम भगवान वाले हैं।
कभी इक साँस भी जो अपनी मर्जी से नहीं लेते,
हमारा भाग्य देखो तुम कि हम उनके हवाले हैं।
'ज़िया' नफ़रत की दुनिया से हमें तो दूर रहना है,
मुहब्बत वाले हैं हम लोग हम तो इश्क़ वाले हैं।
- सुभाष पाठक'ज़िया'
शिवपुरी, मध्यप्रदेश
परिचय -
प्रकाशन- 1.शेरी मजमुआ ' दिल धड़कता है' (मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी भोपाल से उर्दू में 2020 में प्रकाशित)
2.‘तुम्हीं से ज़िया है’ ग़ज़ल संग्रह 2022 पुरस्कृत
3.'हम लिखें ज़िंदगी ज़िंदगी' ग़ज़ल संग्रह 2023 पुरस्कृत
4. 'सभी मौसम हैं तुझमें ज़िंदगी' गीत संग्रह 2024
देश-विदेश की तमाम साहित्यिक पत्रिकाओं, ग़ज़ल विशेषांकों में ग़ज़लें एवं साक्षात्कार प्रकाशित।
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संपादन- 1.ये नए मिज़ाज का शहर है- ग़ज़ल संग्रह
2.ये असर होता है दुआओं में - ग़ज़ल संग्रह
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