बिहार के कालजयी रचनाकार: आदिकाल से आधुनिक काल तक की गौरव यात्रा

बिहार की धरती केवल इतिहास की करवटों की साक्षी नहीं है, बल्कि यह शब्द, साधना और संवेदना की अक्षुण्ण अजस्र धारा भी है। वैशाली के लोकतंत्र से लेकर नालंदा के ज्ञान-शिखर तक, इस भूमि ने हर युग में विचार और भाषा को एक नया आयाम दिया है। जब हम बिहार के साहित्यिक अवदान पर दृष्टिपात करते हैं, तो आदिकाल के लोक-कंठ से लेकर आधुनिक काल के यथार्थपरक विमर्श तक, कालजयी रचनाकारों की एक लंबी और दीप्तिमान श्रृंखला दिखाई देती है।

आइए, युग-दर-युग बिहार के इन शिखर रचनाकारों और उनकी अमर कृतियों के माध्यम से इस पावन भूमि की साहित्यिक यात्रा को समझें।

मैथिल कोकिल विद्यापति (14वीं-15वीं सदी)
बिहार के साहित्यिक इतिहास की शुरुआत महाकवि विद्यापति के बिना अधूरी है। वे आदिकाल और भक्तिकाल के संधि-कवि माने जाते हैं। उन्होंने संस्कृत, अवहट्ट और मैथिली में कालजयी साहित्य की रचना की।

 कृतियाँ: 'पदावली', 'कीर्तिलता', 'कीर्तिपताका', 'गोरक्षविजय'।

विद्यापति ने मैथिली भाषा को जो माधुर्य दिया, उसी के कारण उन्हें 'मैथिल कोकिल' कहा गया। उनकी 'पदावली' में राधा-कृष्ण के प्रेम के माध्यम से लौकिक और अलौकिक श्रृंगार का ऐसा अनूठा संगम है, जिसने आगे चलकर चैतन्य महाप्रभु और पूरे बंगाल-असम के वैष्णव आंदोलन को प्रभावित किया। वे बिहार की भाषाई अस्मिता के पहले महाकवि हैं।

संत दरिया साहब (17वीं-18वीं सदी)
भक्तिकाल और रीतिकाल के संधिकाल में बिहार के भोजपुर (धरकंधा) की धरती पर संत दरिया साहब का प्रादुर्भाव हुआ। वे कबीर की ज्ञानमार्गी और निर्गुण परंपरा के एक महान संत-कवि थे।

 कृतियाँ: 'दरिया सागर', 'ज्ञान दीपक'।

उन्होंने समाज में फैले बाह्याडंबरों, जाति-पाति के भेदों पर करारी चोट की और प्रेम व भ्रातृत्व का संदेश दिया। उनकी भाषा लोकभाषा (भोजपुरी और अवधी मिश्रित) थी, जो सीधे जनमानस के हृदय में उतरती थी।

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' (1908 – 1974)
बिहार के बेगुसराय (सिमरिया) में जन्मे दिनकर जी आधुनिक हिंदी साहित्य के जाज्वल्यमान नक्षत्र हैं। वे ओज, शौर्य और राष्ट्रीय चेतना के अमर गायक हैं।

कृतियाँ: 'कुरुक्षेत्र', 'रश्मिरथी', 'उर्वशी' (जिसके लिए उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला), 'संस्कृति के चार अध्याय' (गद्य)।
 दिनकर की लेखनी में जहाँ एक ओर 'कुरुक्षेत्र' और 'रश्मिरथी' जैसी रचनाओं में अन्याय के खिलाफ हुंकार और पौरुष का नाद है, वहीं 'उर्वशी' में प्रेम और काम अध्यात्म की सूक्ष्म व्याख्या है। उनका गद्य ग्रंथ 'संस्कृति के चार अध्याय' भारत के सांस्कृतिक इतिहास को समझने का सबसे प्रामाणिक दस्तावेज है। वे सही मायनों में युग-चारण थे।

बाबा नागार्जुन (1911 – 1998)
दरभंगा के तरौनी गाँव में जन्मे वैद्यनाथ मिश्र 'यात्री', जिन्हें साहित्य जगत 'बाबा नागार्जुन' के नाम से पूजता है, जन-कवि थे। उन्होंने हिंदी और मैथिली (यात्री उपनाम से) दोनों भाषाओं में युगांतरकारी साहित्य लिखा।

 कृतियाँ: 'युगधारा', 'सतरंगे पंखों वाली', 'बादल को घिरते देखा है' (कविताएँ); 'बलचनमा', 'रतिनाथ की चाची' (उपन्यास)।
नागार्जुन कबीर के बाद हिंदी के सबसे बड़े व्यंग्यकार माने जाते हैं। उनकी कविताओं में बिहार के खेतों, खलिहानों, मजदूरों और शोषितों की धड़कन है। 'बलचनमा' के माध्यम से उन्होंने मिथिलांचल के ग्रामीण यथार्थ और सामंती शोषण को जिस बेबाकी से उभारा, उसने प्रगतिशील साहित्य को नई दिशा दी।

फणीश्वर नाथ 'रेणु' (1921 – 1977)
बिहार के पूर्णिया (अब अररिया) के औराही हिंगना में जन्मे रेणु जी हिंदी साहित्याकाश में आंचलिक उपन्यास के जन्मदाता हैं। उन्होंने अपनी लेखनी से मिट्‌टी को जीवंत कर दिया।
 कृतियाँ: 'मैला आँचल', 'परती परिकथा', 'दीर्घतपा' (उपन्यास); 'ठुमरी', 'अग्निखोर' (कहानी संग्रह - जिसमें 'तीसरी कसम' उर्फ 'मारे गए गुलफाम' शामिल है)।
             रेणु ने भाषा को एक नया मुहावरा दिया। 'मैला आँचल' केवल एक क्षेत्र विशेष की कहानी नहीं है, बल्कि वह धूल, कीचड़, लोकगीत, अंधविश्वास, और बदलते राजनीतिक परिदृश्य का ऐसा महाकाव्यात्मक कोलाज है, जिसने हिंदी कथा-साहित्य को एक नई चेतना से भर दिया।

आचार्य शिवपूजन सहाय (1893 – 1963)
बक्सर के उनवांस में जन्मे शिवपूजन सहाय जी को हिंदी साहित्य में 'भाषा के जादूगर' के रूप में आदर प्राप्त है। वे जितने श्रेष्ठ लेखक थे, उतने ही महान संपादक भी थे।

 कृतियाँ: 'देहाती दुनिया' (हिंदी का पहला आंचलिक उपन्यास माना जाता है), 'वे दिन वे लोग', 'स्मृतिशेष'।
                             उनका गद्य इतना सहज, आत्मीय और प्रवाहपूर्ण है कि पाठक उसमें डूब जाता है। 'देहाती दुनिया' में ग्रामीण जीवन के बाल-मनोविज्ञान और लोक-संस्कृति का जो चित्रण है, वह अद्भुत है। उन्होंने बिहार की राष्ट्रभाषा परिषद को सींचने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई।

रामवृक्ष बेनीपुरी (1899 – 1968)
मुजफ्फरपुर के बेनीपुर गाँव में जन्मे बेनीपुरी जी एक क्रांतिकारी पत्रकार, निबंधकार और रेखाचित्रकार थे। उनकी शैली को 'गद्य-काव्य' की संज्ञा दी जाती है।

प्रमुख कृतियाँ: 'माटी की मूरतें', 'गेहूँ और गुलाब', 'पतितों के देश में', 'अंबपाली'।
             बेनीपुरी जी के रेखाचित्र (जैसे 'माटी की मूरतें') हिंदी साहित्य की अनमोल धरोहर हैं। उन्होंने समाज के अदने, उपेक्षित और साधारण चरित्रों को अपनी शब्द-तुलिका से अमर बना दिया। उनकी भाषा में एक अजीब सा वेग और बिजली जैसी कड़क थी।

आदिकाल के विद्यापति के श्रृंगार और भक्ति से लेकर, दिनकर के ओज, नागार्जुन के जनकंठ, रेणु की आंचलिक सोंधापन और शिवपूजन सहाय के भाषाई जादू तक— बिहार के रचनाकारों ने कभी भी साहित्य को केवल 'स्वांतः सुखाय' (स्वयं के सुख के लिए) नहीं लिखा। यहाँ के लेखकों ने हमेशा समय के माथे पर सवालिया निशान लगाया है और समाज को राह दिखाई है। यही कारण है कि बिहार के ये रचनाकार आज भी काल की सीमाओं को लांघकर प्रासंगिक और कालजयी बने हुए हैं।

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