बहुत कमज़ोर होने पर सरासर टूट जाता है (ग़ज़ल) - ​डॉ. ज़ियाउर रहमान जाफ़री

बहुत कमज़ोर होने पर सरासर टूट जाता है,
अकेला एक धागा हो तो अक्सर टूट जाता है।

बहुत मज़बूत होकर भी ये रिश्ते तोड़ देते हैं,
अगर लोहा मुख़ालिफ़ हो तो पत्थर टूट जाता है।

बहुत छोटे से ये पौधे हवाओं से भी लड़ते हैं,
बड़ा जो पेड़ होता है वह तनकर टूट जाता है।

सज़ाओं के अलग मुंसिफ़ ने पैमाने बनाए हैं,
तुम्हें तो कुछ नहीं होता, मेरा घर टूट जाता है।

कभी तुम उसकी गहराई का अंदाज़ा लगा लेना,
वो जिसके ज़ख़्म पर लगकर ये नश्तर टूट जाता है।

किसी के तंज़ करने की जो आदत चलती रहती है,
ये बाहर से नहीं दिखता है, अंदर टूट जाता है।

वो आकर लड़ तो जाता है परायों से, मगर फिर भी
जो अपने सामने हों तो बराबर टूट जाता है।


डॉ. ज़ियाउर रहमान जाफ़री

डॉ. ज़ियाउर रहमान जाफ़री समकालीन हिंदी साहित्य, विशेषकर हिंदी ग़ज़ल के क्षेत्र में एक विशिष्ट और प्रतिष्ठित नाम हैं। अकादमिक उत्कृष्टता और रचनात्मक लेखन का एक दुर्लभ संयोजन उनके व्यक्तित्व में दिखाई देता है। उन्होंने हिंदी विषय में पीएच.डी. (Ph.D.) करने के साथ-साथ नेट (NET) की परीक्षा उत्तीर्ण की है।
साहित्यिक जगत में डॉ. जाफ़री की पहचान केवल एक संवेदनशील शायर के रूप में ही नहीं, बल्कि एक प्रखर और गंभीर ग़ज़ल आलोचक के तौर पर भी है। उन्होंने हिंदी ग़ज़ल के इतिहास, उसकी संरचना और विकास यात्रा का बहुत ही गहरा अध्ययन और मूल्यांकन किया है।

एक टिप्पणी भेजें

और नया पुराने
बोधायन पत्रिका
बोधायन पत्रिका