मेघ! गगन चढ़ इठलाते हो
इतराते हो!
जनम-जनम का नेह धरा से
झुठलाते हो!
धूल फाँकती गोरैया
मनुहार कर रही,
धूप धरा से दुश्मन-सा
व्यवहार कर रही,
उतर भूमि पर इनको
क्यों न समझाते हो!
छाया भी अब हुई अगन-सी
पेड़ों वाली,
ताल-तलैया जीवन-रस अब
खोने वाली,
रूठ गईं ये, इन्हें न काहे
दुलराते हो!
आओ, उतरो मेघ!
नेह की वर्षा लेकर,
रूठ गए मुझसे
वैरी के उकसाने पर,
भूखी-प्यासी प्रेयसी से
क्यों कतराते हो!
-हरिनारायण सिंह 'हरि'
समस्तीपुर, बिहार
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नवगीत