आज हम हिंदी साहित्य और उर्दू शायरी की सबसे अनुशासित, गणितीय और वैज्ञानिक विधा 'ग़ज़ल' के शिल्प-विधान पर चर्चा करेंगे। ग़ज़ल जितनी भावप्रधान है, उतनी ही यह छंद और संगीत के कड़े पहरे में जन्म लेती है। इसके शिल्प-विधान के मुख्य रूप से पाँच स्तंभ हैं: बह्र (मीटर), रदीफ़, क़ाफ़िया, मतला और मक़्ता। आइए, इन तत्वों को इनके व्यावहारिक और शास्त्रीय नियमों के साथ समझते हैं।"
बह्र और अर्कान — गणितीय और शुद्ध रूप
ग़ज़ल की सबसे पहली और अनिवार्य शर्त है उसका 'बह्र' (छंद) में होना। बह्र वह तराजू है जिस पर ग़ज़ल के शब्दों का वज़न (मात्रा-भार) तोला जाता है। ग़ज़ल का प्रत्येक मिसरा (पंक्ति) एक ही निश्चित गति और लय में होना चाहिए।
शास्त्रीय अरूज़ (छंदशास्त्र) में इन लयों को मापने के लिए कुछ मूल शब्द या खंड तय किए गए हैं, जिन्हें 'अर्कान' (Rukn का बहुवचन) कहा जाता है। आइए दो अत्यंत प्रसिद्ध और मधुर बह्रों के गणित को समझते हैं:
(क) बह्र-ए-हज़ज (मुसम्मन सालिम)
मूल रुक्न (अर्कान): 'मफ़ाईलुन' (Ma-faa-ee-lun)
मात्रा-भार (वज़न): 1222 (लघु-गुरु-गुरु-गुरु)
कुल संरचना: जब यह खंड एक पंक्ति में चार बार दोहराया जाता है (1222 ×4):
1222 \ 1222 \ 1222 \1222
सुंदर उदाहरण:
"शराफ़त छोड़ दी मैंने, नज़ाकत छोड़ दी मैंने।"
(श-रा-फ़त = 122 इस प्रकार यह पूरी पंक्ति 1222 \4 के वज़न पर सटीक बैठती है)
(ख) बह्र-ए-रमल (मुसम्मन सालिम)
मूल रुक्न (अर्कान): 'फ़ाइलातुन' (Faa-i-laa-tun)
मात्रा-भार (वज़न): 2122 (गुरु-लघु-गुरु-गुरु)
कुल संरचना: जब यह खंड एक पंक्ति में चार बार दोहराया जाता है (2122 × 4):
2122 / 2122 /2122 /2122
(ग) बह्र-ए-मुतदारिक (एक बेहद लोकप्रिय और आसान मीटर)
मूल रुक्न (अर्कान): 'फ़ाइलुन' (Faa-i-lun)
मात्रा-भार (वज़न): 212 (गुरु-लघु-गुरु)
कुल संरचना: जब यह खंड चार बार दोहराया जाता है (212 × 4):
212 \ 212 \ 212 \ 212
सुंदर उदाहरण:
"आइना सामने जब दिखाया नहीं ..."
यदि ग़ज़ल का कोई भी मिसरा (पंक्ति) इस निर्धारित मात्रा-भार से ज़रा भी भटकता है, तो उसे तकनीकी रूप से 'ख़ारिज-अज़-बह्र' (छंद भंग) कहा जाता है।
रदीफ़ :
शेर की दोनों पंक्तियों के अंत में जो शब्द या शब्दों का समूह बिना किसी बदलाव के, ज्यों का त्यों दोहराया जाता है, उसे रदीफ़ कहते हैं।
उदाहरण (अदम गोंडवी):
"काजू भुने प्लेट में व्हिस्की ग्लास में,
उतरा है रामराज्य विधायक निवास में।"
यहाँ ' में' रदीफ़ है। (यह गज़ल को संगीतात्मक ठहराव देता है)।
क़ाफ़िया :
रदीफ़ से ठीक पहले आने वाले तुकांत या समान ध्वनि वाले शब्दों को क़ाफ़िया कहा जाता है। बिना क़ाफ़िया के ग़ज़ल मुमकिन ही नहीं है।
उदाहरण (दुष्यंत कुमार):
"यहाँ तक आ गए हैं सिलसिले शामिल ज़माने में,
कि अब तो हर कोई रोता है अपने ही फ़साने में।"
यहाँ अंत में आने वाला शब्द 'में' तो रदीफ़ है, लेकिन उससे ठीक पहले आए हुए शब्द ' ज़माने' और 'फ़साने' के भीतर की जो स्वर-ध्वनि (आमिल / आने) है, वही क़ाफ़िया है।
मतला : ग़ज़ल के सबसे पहले शेर को 'मतला' कहते हैं। इसकी विशेषता यह होती है कि इसके दोनों मिसरों (पंक्तियों) में क़ाफ़िया और रदीफ़ का होना अनिवार्य है।
मक़्ता : ग़ज़ल के अंतिम शेर को 'मक़्ता' कहते हैं। इसकी शर्त यह है कि इसमें कवि या शायर अपना उपनाम (तख़ल्लुस) दर्ज करता है।
जैसे मैं अपने मक़्ता में कहूँ:
संशय अनबन खेल और धोखा,
'प्रीति ' न रह पाई उलझन में
यहाँ 'प्रीति' मेरा तख़ल्लुस है, जो यह प्रमाणित करता है कि यह इस रचना का समापन है।
"संक्षेप में कहें, तो ग़ज़ल का शिल्प विधान एक ऐसा बारीक धागा है जो भावों की मोतियों को बिखरने नहीं देता। गति, लय, तुक, बह्र और अर्कान (जैसे फ़ाइलातुन, मफ़ाईलुन) का यह गणितीय संतुलन ही ग़ज़ल को कालजयी बनाता है। धन्यवाद।"