वक्त के साथ जो भी चलते हैं,
अपने हालात को बदलते हैं।
अपने घर से वह जब निकलते हैं,
अहले-दिल अपना हाथ मलते हैं।
कामयाबी क़दम न चूमे क्यों,
ठोकरें खा के जो सँभलते हैं।
उनको भी कामयाब कर मौला,
जो मुझे देख करके जलते हैं।
जब से रोशन हुआ है यह सूरज,
कितनी नज़रों को आज खलते हैं।
- सूरज तिवारी
भदोही
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