हिंदी नाट्य-परंपरा में जयशंकर प्रसाद के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के पश्चात यदि किसी नाटककार ने हिंदी रंगमंच को आधुनिकता की ज़मीन प्रदान की और उसे अमूर्तता से निकालकर 'दृश्य-सत्य' में रूपांतरित किया, तो वे मोहन राकेश हैं। मोहन राकेश मात्र एक नाटककार नहीं थे, बल्कि वे हिंदी नाटक के उस 'संक्रांति-काल' के प्रतीक हैं जहाँ पारंपरिक नाट्य-संरचना टूटती है और आधुनिक मनुष्य का अस्तित्वगत द्वंद्व, संत्रास, अकेलापन और खंडित व्यक्तित्व मंच पर जीवंत हो उठता है।
मुख्य रूप से तीन पूर्ण नाटकों—आषाढ़ का एक दिन (1958), लहरों के राजहंस (1963) और आधे-अधूरे (1969)—के माध्यम से उन्होंने हिंदी रंगमंच को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। (उनके अपूर्ण नाटक पैर तले की ज़मीन को बाद में कमलेश्वर ने पूर्ण किया था।) राकेश का यह नाट्य-त्रयी हिंदी साहित्य के इतिहास में युग-परिवर्तक और कालजयी मील का पत्थर सिद्ध हुआ।
आषाढ़ का एक दिन :
1958 में प्रकाशित आषाढ़ का एक दिन को आधुनिक हिंदी साहित्य का पहला यथार्थवादी और आधुनिक नाटक माना जाता है। महाकवि कालिदास के ऐतिहासिक-काल्पनिक जीवन-वृत्त को केंद्र में रखकर रचा गया यह नाटक वस्तुतः 'कलाकार और राजसत्ता' के अंतःसंबंधों और द्वंद्व की गहन पड़ताल करता है।
क्या कोई संवेदनशील कलाकार राजसत्ता के संरक्षण, वैभव और प्रलोभनों में बँधकर अपनी मौलिक सर्जनात्मकता को अक्षुण्ण रख सकता है?—यह प्रश्न नाटक के अंतःकरण में स्पंदित होता है। कालिदास का उज्जयिनी जाना और 'मातृगुप्त' बनकर लौटना इस बात का साक्ष्य है कि सत्ता का संरक्षण कलाकार को भौतिक ऊँचाइयाँ तो दे सकता है, किंतु उसकी आत्मीय चेतना को सुखा देता है।
इस नाटक की आत्मा 'मल्लिका' है। मल्लिका ग्राम्य सरलता, निश्छल समर्पण और उदात्त प्रेम की वह प्रतिमूर्ति है जो कालिदास के विकास के लिए स्वयं को सहर्ष नेपथ्य में धकेल देती है। मल्लिका का प्रेम देह-सुख या अधिकार का आकांक्षी नहीं है, बल्कि वह भावना के स्तर पर लीन है। उसका कालजयी कथन नाटक के इस मर्म को उद्घाटित करता है:
"मैंने भावना में भावना का वरण किया है... मेरे लिए यह संबंध किसी अन्य संबंध से बड़ा है।"
लहरों के राजहंस:
अश्वघोष के महाकाव्य सौंदरनंद की कथा-भूमि पर आधारित लहरों के राजहंस भौतिक सुख और आध्यात्मिक शांति के बीच झूलते आधुनिक मनुष्य के भटकाव की गाथा है। नाटक का मुख्य पात्र 'नंद' (बुद्ध का सौतेला भाई) दो परस्पर विरोधी ध्रुवों के मध्य त्रिशंकु की भाँति लटका हुआ है—एक तरफ उसकी रूपसी, आत्म-मुग्ध और सौंदर्य-सचेत पत्नी 'सुंदरी' का एंद्रिक आकर्षण है, तो दूसरी तरफ महात्मा बुद्ध का अनासक्ति और शांति का मार्ग।
यह नाटक केवल ऐतिहासिक कथा का पुनराख्यान नहीं है, बल्कि यह आधुनिक काल के 'अनिर्णय' और मानसिक विभाजन का मनोवैज्ञानिक आलेख है। 'लहरों पर तैरते राजहंस' का प्रतीक मनुष्य के उस चंचल और चंचल-मन का बिंब है जो न तो संसार को पूरी तरह भोग पाता है और न ही संन्यास को आत्मसात कर पाता है। नंद का अंतःसंघर्ष आज के दिग्भ्रमित मनुष्य की त्रासदी को उजागर करता है।
आधे-अधूरे:
1969 में रचित आधे-अधूरे को समकालीन हिंदी नाट्य-साहित्य की सबसे महत्त्वपूर्ण यथार्थवादी कृति स्वीकार किया जाता है। ऐतिहासिकता के खोल को उतारकर राकेश यहाँ सीधे दिल्ली के एक टूटन-ज़दा मध्यवर्गीय परिवार के ड्राइंग-रूम में प्रवेश करते हैं।
यह नाटक स्त्री-पुरुष संबंधों के बीच उपजती अजनबीपन की खाई, संवादहीनता और आर्थिक-भावनात्मक असंतोष को बेपर्द करता है। नाटक की केंद्रीय पात्र 'सावित्री' एक 'पूर्ण पुरुष' की तलाश में है, परंतु उसे हर पुरुष में कोई न कोई अधूरापन दिखाई देता है। पति का निकम्मापन, बच्चों का दिशाहीन भटकाव और आर्थिक तंगी सावित्री को एक खंडित और आधी-अधूरी स्त्री के रूप में तब्दील कर देते हैं।
नाटक की सबसे बड़ी तकनीकी एवं वैचारिक उपलब्धि यह है कि सावित्री से जुड़े इन पाँचों पुरुषों की भूमिका एक ही अभिनेता निभाता है। यह प्रयोग इस कड़वे यथार्थ को रेखांकित करता है कि चेहरे और मुखौटे बदलते हैं, किंतु पुरुष-सत्तात्मक व्यवस्था में स्त्री के लिए 'पूर्णता' का अभाव और समस्या का मूल ढाँचा यथावत बना रहता है। यहाँ समाज का हर व्यक्ति 'आधी-अधूरी' जिजीविषा जीने को अभिशप्त है।
मोहन राकेश ने हिंदी नाट्य-जगत को केवल नई विषय-वस्तु ही नहीं दी, बल्कि शिल्प, रंग-संकेत और भाषा के धरातल पर क्रांतिकारी परिवर्तन किए। मोहन राकेश का स्पष्ट मानना था कि नाटक की भाषा लिखित या पुस्तकीय न होकर 'बोली जाने वाली दृश्य-भाषा' होनी चाहिए। उन्होंने भारतेंदु और प्रसाद कालीन लंबे, संस्कृतनिष्ठ और काव्यात्मक भाषणों को खारिज कर छोटे, चुस्त और सांकेतिक संवाद लिखे। उन्होंने संवादों के बीच 'विराम' का अद्वितीय प्रयोग किया, जिससे शब्दों से परे फैली चुप्पी और संवादहीनता की अनुभूति दर्शक तक पहुँचती है।
जयशंकर प्रसाद के नाटकों पर जो 'अमंचनीयता' या कठिन मंचन का आरोप लगता था, उसे राकेश ने अपनी व्यावहारिक नाट्य-दृष्टि से पूरी तरह समाप्त कर दिया। उनके नाटकों के रंग-निर्देश इतने सूक्ष्म और सटीक हैं कि वे निर्देशक और अभिनेता के लिए मार्गदर्शक का कार्य करते हैं।
राकेश के यहाँ स्त्री मात्र पुरुष की अनुगामिनी या सहचरी नहीं है, बल्कि वह अपनी निजता और चयन के प्रति पूर्णतः सजग है।
आषाढ़ का एक दिन की 'मल्लिका' में प्रेम की उदात्तता और आत्म-त्याग का शिखर है।
लहरों के राजहंस की 'सुंदरी' अपने सौंदर्य, व्यक्तित्व और अधिकार के प्रति सजग स्त्री है।
आधे-अधूरे की 'सावित्री' आधुनिक युग की उस संघर्षरत स्त्री का प्रतिनिधित्व करती है जो पारंपरिक ढाँचे को तोड़कर अपनी आजीविका और भावनात्मक पूर्णता की तलाश में छटपटा रही है।
मोहन राकेश का साहित्य केवल अपने समय का दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि वह काल के सीमाओं को लाँघकर आज भी उतना ही प्रासंगिक है। उन्होंने हिंदी नाटक को कमरे की अलमारियों से निकालकर आधुनिक रंगमंच की जगमगाती रोशनी तक पहुँचाया। विषय की संवेदनशीलता, मनोवैज्ञानिक गहराई और रंगमंचीय भाषिक-शिल्प के अद्भुत समन्वय के कारण मोहन राकेश का नाट्य-अवदान हिंदी साहित्य का एक अमर और कालजयी अध्याय है।
- बोधायन पत्रिका