प्राणनाथ बन जाओ कान्हा, चरण सदा धरती॥
चर्चा करती सखियों से नित, तेरे नाम हुई।
बाँह पकड़ता नदी किनारे, अब बदनाम हुई।
आस जगी ना प्रणय सूत्र में, राधा दुख सहती।
प्राणनाथ बन जाओ कान्हा, चरण सदा धरती॥
मन मंदिर में बसे कन्हैया, पीड़ा तुम जानो।
अँखियाँ ओझल हुईं अभी भी, तुम मत कम मानो।
बड़ी अभागन हूँ मैं मोहन, किससे अब कहती।
प्राणनाथ बन जाओ कान्हा, चरण सदा धरती॥
कृष्ण पुकारें बंसी गाए, अब वो घूम रहे।
कहाँ गई राधा ग्वालों से, अब वो पूछ रहे।
राधा विरह-अग्नि के दुख में, पल-पल है जलती।
प्राणनाथ बन जाओ कान्हा, चरण सदा धरती॥
सूरज तिवारी
भदोही, उत्तर प्रदेश