सहमे-सहमे हैं सर वाले,
चारों तरफ़ हैं पत्थर वाले।
प्यास की शिद्दत को क्या जानें,
दरिया वाले, सागर वाले।
पाँव नहीं फैलाते हैं ख़ुद,
अपनी छोटी चादर वाले।
मौत के आगे हो गए बेबस,
जादू वाले, मंतर वाले।
मत फेंको औरों पे पत्थर,
तुम हो शीशे के घर वाले।
जाने क्यों अब आते नहीं हैं,
ख़्वाब सुहाने मंज़र वाले।
हैं कितने बेदर्द 'ग़ज़ल' वो,
खून के प्यासे ख़ंजर वाले।
—श्वेता ग़ज़ल
पटना, बिहार
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