आज रचना अपने हॉस्टल की खिड़की पर बैठी अपलक बाहर हो रही वर्षा को निहार रही थी। सामने गार्डन में आम के पेड़ों की टहनियों पर चिड़ियाँ अपने परिवार के साथ चहचहाहट के उत्सव में मग्न थीं।
उन्हें देखकर रचना का मन भी अपनों के उसी उत्सव में रमने लगा। उसे याद आया कि कैसे जब भी बारिश होती थी, वह किसी न किसी बहाने छत पर भाग जाया करती थी। माँ यह बात बखूबी जानती थीं। वह हर बार टोकतीं, “अरे इ बरखा अच्छा ना होला, मत भींज, ना त घाव हो जाइ!” लेकिन रचना कहाँ मानने वाली थी...। जब वह भींग कर नीचे आती, तो माँ मुँह फुलाकर तौलिया आगे बढ़ाते हुए कहतीं, “ले बाल पोंछ ले आ जल्दी कपड़ा बदल ले, ना त बुखार आई त हम ओशही छोड़े देब मरे ले!” रचना भी मुँह बनाती हुई अपने कमरे में चली जाती।
तभी माँ का वह पसंदीदा गीत उसके कानों में गूँजने लगता, जो उस बारिश को और भी सुंदर और संगीतमय बना देता था—
“बरसु-बरसु असरेसवा
भीगेला बखरी
तोरे ओरीया के पनीया
नहाली गोरीया
चार रूपइया पियवा
तोरे नोकरी
हमके नथिया गढइब की
बनइब बखरी...”
एक हल्की-सी मुस्कराहट रचना के चेहरे पर तैर गई और उसका हाथ खुद-ब-खुद बगल में रखे फ़ोन की तरफ़ बढ़ गया। फ़ोन पर नंबर डायल करते ही उँगलियाँ अचानक ठिठक गईं। उसने खिड़की से बाहर आकाश की तरफ़ देखा, जहाँ बारिश और तेज़ हो चुकी थी—ठीक वैसे ही, जैसे उसके मन के भीतर यादों का सावन उमड़ पड़ा था और आँखों से कोरें बह निकली थीं।
उसका मन बस एक ही सवाल दोहराए जा रहा था—"हम समय रहते इन लम्हों, इस बारिश और अपनों की अहमियत क्यों नहीं समझ पाते?"
- किरण परशुराम चतुर्वेदी
भभुआ, बिहार
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