डॉ. प्रीति सुमन कला क्षेत्र की बहुप्रतिभाशाली व्यक्तित्व हैं। आप सृजन, अभिनय, निर्देशन सभी में निपुण हैं। सृजन में भी बहुविधा आपके आयाम हैं, जैसे कविता, ग़ज़ल, गीत आदि। नाटक आपकी प्रिय विधा है। खोज और अनुसन्धान में भी आपकी रुचि है। समाज को चेतनशील, विवेकी, आदर्शवान और सांस्कृतिक-नैतिकवान बनाने हेतु आपका सृजन क्षेत्र संकल्पित है।
जो समाज को देते हैं, समाज उसे भी देता है। कवयित्री, निर्देशिका, नाटककार और अभिनेत्री के रूप में आपने जो समाज सेवा की है, इसके बदौलत अनेक पुरस्कारों, सम्मानों और अभिनंदनों से आपको नवाज़ा गया है। आपने अनेक मंचों पर अपनी प्रतिभा को सम्मानित किया है, अपनी लेखनी से लोगों का दिल जीता है। अपनी हास्य काव्यों से एक ओर हँसाया है, तो दूसरी ओर लोगों को संवेदित भी किया है। सरलता, सरसता और गांभीर्य आपकी साझा विशेषताएँ हैं।
डा. सुमन की नयी कृति है – 'अतिथि देवो भवः' एवं 'राजमहल की अंतिम रात'। यह नाट्यकृति है। ऊपर ही लिखा हुआ है – दो नाटक। एक है – 'अतिथि देवो भवः'। दूसरी है – 'राजमहल की अंतिम रात'। नाटक कहा गया है, फिर भी प्रकृति और संरचना, स्वरूप तथा आयाम के दृष्टिकोण से यह एकांकी है। एकांकी नाटक की उपविधा है।
विवेच्य एकांकी 'राजमहल की अंतिम रात', प्रसिद्ध पूर्वीय महाकाव्य रामायण के एक अंश के कथानक की धरातल पर आधारित है। जब गर्भवती सीता को वनवास जाना होता है, तब अयोध्या के राजमहल की अंतिम रात व्यतीत होनी होती है; इसी रात जानकी पर जो बीतती है, इसी कौतूहल को संबोधित करती है यह सृजना।
‘राजमहल की अंतिम रात’ में राम अत्यधिक उलझन में होते हैं। उलझन से अत्यधिक असहज होते हैं। कई दिनों तक राम उदास रहते हैं। सीता से संवाद भी नहीं करते हैं। राम की उदासी सीता को खाए जा रही है। सीता अपनी दासी से इसका कारण पता लगाने को कहती हैं। दासी जानकी की बालसखा भी है। दोनों सखी की तरह हैं। एक-दूसरे से मन की बात कहती हैं। जानकी के विश्वास को तोड़ना नहीं चाहती है दासी। उसे पता हो जाता है कि किसी धोबी के कहने से उदास हैं राम। धोबी का आक्षेप होता है – सीता अपवित्र हो गई हैं। रावण के घर में रहने से अपवित्र सीता को राजमहल में रखना अशुभ है। इस अफ़वाह ने अयोध्या नगरी में हलचल मचा दी है। राम जानते हैं कि सीता गंगा से भी पवित्र हैं। अब दासी भी जब नहीं बताती है, तब उसे कसम दिलाती हैं और यथार्थ जानकारी लेती हैं। सुनते ही पैर के नीचे से धरती खिसक जाती है। फिर अपने आप को संभालती हैं। माता से खुद को संभालने की शक्ति माँगती हैं सीता।
छह दृश्यों में विभक्त ‘राजमहल की अंतिम रात’ एकांकी के प्रथम और अंतिम दृश्य राजमहल की बूढ़ी दासी और राजकुमारी के बीच हुआ संवाद है। प्रथम दृश्य में संवाद आरंभ होता है। बूढ़ी दासी उदासी का गीत गाती है और उस गीत का अर्थ खोजती है राजकुमारी। राजकुमारी को अतीत का यथार्थ बताती हैं जहाँ संपूर्ण कथानक है और अंतिम दृश्य फिर वर्तमान में ले आता है। कथानक में पूर्वदीप्ति (फ्लैशबैक) का जो नवीन किस्म से उपयोग किया गया है, वह अपने आप में चित्ताकर्षक और स्तरीय है।
एकांकी के मूल कथानक में पौराणिक पात्रों का उपयोग किया गया है। कथा जिस माध्यम से प्रस्तुत की गई है, वह पात्र भी पौराणिक ही है। विषयवस्तु और कथ्य के मुताबिक पात्र, परिवेश और दृष्टिबिंदु का सार्थक और अत्युत्तम उपयोग किया जाना नाटक की उपलब्धि है। वियोगान्त नाटक ‘राजमहल की अंतिम रात’ नाटककार डा. प्रीति सुमन की नाट्ययात्रा की महत्तम उपलब्धि भी है।
‘राजमहल की अंतिम रात’ में प्रयुक्त भाषाशैली में निजत्व है। संवाद में एकांकीकार ने जानकी की जन्मभूमि की कथ्यशैली, लहज़े और महक का गज़ब प्रयोग किया है। यह बज्जिका मिट्टी और महक का सुंदर संयोग है।
मंचीयता को नाटक की आत्मा माना जाता है। प्रकाशन पूर्व ही संभवतः मंचित हो चुकी ‘राजमहल की अंतिम रात’ एकांकी में मंचीयता को केंद्र में रखकर ही लिखा गया है। दृश्यारंभ के निर्देशन, पात्रों का परिचय और परिधान, मंच सज्जा, पात्रों का हावभाव—सभी पक्षों को नाटककार ने जिस तरह सजाया है, वह काबिले तारीफ़ है। संपूर्ण दृष्टिकोण से ‘राजमहल की अंतिम रात’ अत्यंत सफल एकांकी है, नाटक है। शीर्षक भी पूर्णतः सार्थक है।
अत्यंत सार्थक एकांकी ‘राजमहल की अंतिम रात’ की नींव पर नाटककार डा. प्रीति सुमन की मुख्य विशेषताओं को इस प्रकार अंकित किया जा सकता है:
– पूर्वीय दर्शन में विशेष अभिरुचि
– सामाजिक मूल्यों और मान्यताओं को बरकरार रखने की अभिलाषा
– अपनी संस्कृति पर विशेष गर्व
– नारी पात्र चयन में दक्षता
– विषयवस्तु के चयन, कथानक की बुनावट, दृश्यों की बनावट, पात्र और परिवेश में परिपक्वता
– कथ्य में मौलिकता
– प्रस्तुति, संवाद और भाषाशैली में अपनी मिट्टी की महक
– नाटकीयता में स्वाभाविकता और मंचीय सचेतना
– वैश्विक विषय में आंचलिकता की सुगंध भरने में सक्षम
– स्वत्व पर मोह।
अंत में, नाटककार डा. सुमन की प्रथम नाट्यकृति ‘राजमहल की अंतिम रात’ की नींव में उनकी नाट्यकारिता की अनेक झलकियाँ हैं। डा. सुमन की नाट्यकारिता अनेक संभावनाओं से भरी है। आगामी कृति और सफल और सक्षम बने, इन्हीं हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
- सञ्जय साह मित्र
वरिष्ठ साहित्यकार
रौतहट, नेपाल
पुस्तक - अतिथि देवो भवः एवं राजमहल की अंतिम रात
नाटककार - डॉ. प्रीति सुमन
प्रकाशक - विद्या विहार, दिल्ली ( प्रभात प्रकाशन समूह)
मूल्य - 250 रुपया मात्र
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