पहचान बचा कर रख लेना(ग़ज़ल)— अर्जुन प्रभात



खोते जीवन की कुछ तो पहचान बचा कर रख लेना,
प्रेम, दया, अपनत्व और ईमान बचा कर रख लेना।।

आने वाली पीढ़ी जब पूछेगी दुनिया कैसी थी,
बतलाने को घर के ये सामान बचा कर रख लेना।

मिट्टी का वह घर-दरवाज़ा, आँगन वह तुलसी-चौरा,
और जहाँ सब बैठें वह दालान बचा कर रख लेना।

रख लेना बाबा का लोटा, लाठी, खटिया और पोथी,
रखना जाँता, चक्की, गेहूँ, धान बचा कर रख लेना।

रख लेना वह बाग़-बग़ीचा, पीपल-बरगद की छैयाँ,
पुश्तैनी वह खेत और खलिहान बचा कर रख लेना।

रख लेना बैलों की जोड़ी, हल-हरीश पालो-लगना,
आदिम युग के सारे अनुसंधान बचा कर रख लेना।

समदन, सोहर और पराती, बिरहा, कीर्तन और भजन,
अपने मन में पुरखों के अरमान बचा कर रख लेना।

मंदिर, मस्जिद, गिरिजाघर, गुरुद्वारे चाहे ढह जाएँ,
मन में लेकिन पूरा हिंदुस्तान बचा कर रख लेना।

अर्जुन, परिवर्तन का होना कभी न रुकने पाया है,
सब कुछ चाहे बदले पर इंसान बचा कर रख लेना।

— अर्जुन प्रभात
मोहिउद्दीन नगर, समस्तीपुर, बिहार
लेखन - गद्य और पद्य की विविध विद्याओं में सक्रिय लेखन 
प्रकाशन - विविध विद्याओं में एक दर्जन पुस्तकें प्रकाशित 
संपादन - प्रतिष्ठित पत्रिका मंदाकिनी का 25 वर्षों तक संपादन 
पुरस्कार / सम्मान - देश की अनेक प्रतिष्ठित साहित्यिक सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा विविध सम्मानों/ पुरस्कारों से सम्मानित - पुरस्कृत 
संप्रति - इंटर कॉलेज में प्राचार्य

एक टिप्पणी भेजें

और नया पुराने
बोधायन पत्रिका
बोधायन पत्रिका