कुण्डल छन्द-विधान (आलेख) - आचार्य विजय गुंजन


कुंडलिया (कुंडल) छंद एक मिश्रित मात्रिक छंद है, जो दोहा और रोला के संयोग से बनता है। यह ६ पंक्तियों का छंद है, जिसमें कुल २४ मात्राएँ प्रति चरण (११ + १३ के योग से) होती हैं, और यह जिस शब्द से शुरू होता है, उसी पर समाप्त भी होता है।
कुंडलिया (कुंडल) छंद की मुख्य विशेषताएँ:
बुनावट: चरण (पंक्तियाँ) — प्रथम २ दोहा, अंतिम ४ रोला।
मात्राएँ: प्रत्येक चरण में २४ मात्राएँ (दोहा में १३ + ११, रोला में ११ + १३)।
नियम: जिस शब्द से छंद शुरू होता है, उसी शब्द से अंत होता है।
यति: दोहा के दूसरे चरण का अंतिम भाग रोला के पहले चरण की शुरुआत में दोहराया जाता है।

पद्यात्मक परिचय:
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कुंडलिया (१)
कुंडलिया अनमोल है, मिश्रित मात्रिक छंद।
दोहा-रोला से बने, तनिक न इसमें द्वंद्व।।
तनिक न इसमें द्वंद्व, पंक्ति छह का गठबंधन।
दोहा का शब्दादि, अंत इसका अभिव्यंजन।
कह गुंजन कविराय, हृदय हर लेता छलिया।
सुधि जन कहते बूझ, सदा इसको कुंडलिया।।
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कुंडलिया (२)
रोला दोहा को पकड़, उल्टा देता टाँग।
प्रथम चरण ग्यारह रखे, दूजा तेरह सांग।।
दूजा तेरह सांग, इसी की चार पंक्तियाँ।
दोहा की दो मिलें, और फिर भरें शक्तियाँ।
कह गुंजन कविराय, पाँत छह का यह टोला।
कुंडलिया में मुख्य, भूमिका रखता रोला।।
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इस प्रकार इस छंद में छह पंक्तियाँ होती हैं और हर पंक्ति में २४-२४ मात्राएँ होती हैं, अर्थात् कुल मिलाकर २४ ✖️ ६ = १४४ मात्राओं का यह छंद होता है।
अब उक्त किसी एक कुंडलिया की पंक्तियों के शब्दों में अक्षरशः मात्रा-गणना कर नीचे दर्शाने का प्रयास किया जा रहा है:

कुंडलिया (१)
S | | S | | S | S S | |
कुंडलिया अनमोल है, मिश्रित
S | | S | = २४
मात्रिक छंद।
S S S S S |S | | | | | | S
दोहा-रोला से बने, तनिक न इसमें
S | = २४
द्वंद्व।।
S । । । । । S S। S । ।। S
तनिक न इसमें द्वंद्व, पंक्ति छह का
। । S । = २४
गठबंधन।
S S S S S । S। ।। S
दोहा का शब्दादि, अंत इसका
।S । ।। = २४
अभिव्यंजन।
११ २११ ११२१ १११ ११ २२
कह गुंजन कविराय, हृदय हर लेता
११२
छलिया।
११ ११ ११२ २२ १२ ११२
सुधि जन कहते बूझ, सदा इसको
२११२ = २४
कुंडलिया।।

—आचार्य विजय गुंजन 

उदाहरणार्थ अन्य दो कुंडलिया और:
१. कुंडलिया
नर-नारी में हो गई, अधिकारों की जंग।
कुचल पुरुष के अहं को, नारी हुई दबंग।।
नारी हुई दबंग, पुरुष अब नैन झुकाए।
रंग बदलते देख, पुरुष अब सहमा जाए।।
कह 'सरना' कविराय, प्रणय तो है बीमारी।
आँखें करके बंद, जलें दोनों नर-नारी।।
(सुशील सरना)

२. कुंडलिया
हिंदी की ये दुर्दशा, देख लजाती लाज।
पुस्तक बिकती तौल में, चौराहे पर आज।।
चौराहे पर आज, नहीं कवि कविता गावे।
मोबाइल हर हाथ, कौन तब सुने, सुनावे।।
कहे 'नंद' मन मार, कवित-मति अब भी जिंदी।
कवियों के ही बीच, रास करती है हिंदी।।
(नंद कुमार)


- आचार्य विजय गुंजन 
   पटना, बिहार 


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