सकल विषपायी गीतकार नीलकंठ वर्मा के गीतों का साम्राज्य (पुस्तक समीक्षा) — ज्वाला सांध्यपुष्प


समस्तीपुर ज़िले की उर्वर साहित्यिक भूमि कभी प्यासी नहीं रही। कभी मस्ती और यौवन के कवि आरसी प्रसाद सिंह तो कभी 'अरुण रामायण' के पद्मश्री पोद्दार रामावतार अरुण की जीवंत उपस्थिति से यह ज़िला सदैव स्पंदित-आंदोलित होता रहा, तो बाद के दिनों में डॉ. हरिवंश तरुण, राजमणि राय मणि, नीलकंठ वर्मा प्रभृति कवियों ने इसकी साहित्यिक मान-मर्यादा में पर्याप्त श्रीवृद्धि की; जिनमें कविवर नीलकंठ वर्मा अपने छायावादी संस्कारों से स्नात गीतों के लिए आज भी स्मरणीय हैं। कविताओं में इनका मानवतावादी दृष्टिकोण हो या आत्मपीड़ा से युक्त दिव्याभिव्यक्ति—सभी जगहों पर भावों की प्रवणता और उसकी अर्थवत्ता की जिस खूबी से प्रस्तुति दी है, पाठक दाँतों तले उँगली दबाने को विवश हो जाते हैं, उनकी विशिष्ट कलात्मकता के कायल हो जाते हैं।
वर्मा जी के 'शोला और शबनम', 'मुरली-वादन', 'पर नूपुर बज न सका' और 'विरह वंशी बजाऊँगा'—कुल चार काव्य-संकलन प्रकाशित हुए, जिनमें से दो संकलनों का पुनर्प्रकाशन उनके यशस्वी पुत्रों ने कराकर अपने पूज्य पिता की आत्मिक यादों के तर्पण करने के सारस्वत धर्म का निर्वहन किया है।
इन दोनों सद्य पुनर्प्रकाशित संकलनों के अध्ययनोपरांत ऐसा अनुमान किया गया कि मानवतावाद और प्रिया-बिछुड़न की असीम वेदना ही वर्मा जी के काव्य की मुख्य प्रवृत्तियाँ रही हैं और करुण एवं वियोग शृंगार रस ही जिनके मानक उपकरण रहे हैं। इन्होंने वंशी भी बजाई, नूपुर की रुनझुन भी सुनी, मगर कहीं भी संयोग शृंगार की धार बहती नहीं दिखी; बल्कि अंतर के आकुल मन-प्राण से नि:सृत शबनमी बूँदों की मानिंद अश्रुकण ही दिखे—कहीं भी स्थूल प्रेम की शृंगारिकता नहीं, बल्कि दग्ध हृदय की वेदना का ही साम्राज्य स्थापित नज़र आया।
संसार में कविता का जन्म ही करुणा से, वेदना से हुआ है—चाहे वह आदिकवि वाल्मीकि का ज़ख़्मी क्रौंच-युग्म हो या फिर प्रसाद, निराला, पंत, महादेवी आदि छायावादियों के दुखों की व्यथा-कथा। सभी जगह कविता का सृजन वेदना की कोख से ही हुआ है; वियोगियों की आहों की ज़मीन से ही उत्तम कविता की खेती संभव हुई है—चाहे प्रसाद की 'घनीभूत पीड़ा' हो या निराला की 'दुख ही जीवन की कथा रही', या फिर महादेवी की 'मैं नीर भरी दुख की बदली'। सभी जगह उमड़-घुमड़कर बादल छा ही जाते हैं, तभी तो असल कविता की बरसात होती है और ऐसे ही महाकवि हमारे पास हैं—कविवर नीलकंठ वर्मा जी, जो बरसने को अपने अंतर में न जाने कितने बादलों को समेटे हुए हैं, जिसे इनके दोनों संकलनों में अनुभव किया जा सकता है।
काव्य संग्रह 'पर नूपुर बज न सका' के मुख्य पृष्ठ पर कवि ने स्वयं अपने गीतों को दो भागों में विभक्त किया है—विचारमूलक और अनुभूतिमूलक, जिन्हें क्रमशः मानवीय संवेदनागत और आत्मगत पीड़ा की कविताएँ कह सकते हैं। और देखा जाए तो दूसरों की पीड़ा से आहत हो जाने वाला ही सुकवि हो जाता है—मानवीय दुखों से जब किसी कवि का हृदय दग्ध हो जाए तो कविता की गंगोत्री फूट पड़ती है। नूपुर और बीन तो अवलंबन हैं, बहाना हैं—कविता के स्वाद को, उसके प्रभाव को गाढ़ा बनाने के उपस्कर हैं। सही में भावों की सांद्रता ही प्रभावी होती है—फीकी शरबत तो बच्चे भी नहीं पीते। फिर यह गीतकार तो समस्त मानवता के हितों का पोषक ठहरा, जिसे लगता है कि धार्मिक उन्मादों में जाने से अच्छा है कि इंसान वैज्ञानिक प्रगति कर चंद्रलोक चला जाए, वहीं नया संसार बसा ले जहाँ न हमें कोई मंदिर, न कोई मस्जिद और न ही गिरजाघर दिखे; बल्कि वह उत्पीड़न और शोषण से मुक्त नए युग की शुरुआत के पक्षधर हैं। देखें इस कवितांश को:
"क़िस्मत के कच्चे धागों में / इंसान बँधने वाला है।
वह चंद्रलोक को जाएगा / संसार नया वह लाएगा।
नवसृजनमयी युगरचना का / इतिहास बदलने वाला है।
धरती भँवर से बोलेगी / ज्वाला निज मुखड़ा खोलेगी,
उत्पीड़न के इस शोषण का / हर दुर्ग पिघलने वाला है।
मंदिर-मस्जिद को तोड़ेगा / गिरजा का घेरा तोड़ेगा।" (पृ. २)
फिर मनुष्य को मनुष्यता के लिए, समस्त इंसानियत के लिए ही जीने का लक्ष्य होना चाहिए—ऐसा कविवर नीलकंठ वर्मा अपने गीतों में भी अपील करते पाए जाते हैं। इनके विचार में आदमी को दूसरों के सुख के लिए अपना उत्सर्ग कर देना चाहिए, उनके ही शब्दों में नीलकंठ बन जाना चाहिए:
"बना अमिय विष पीने को / तो नीलकंठ बन जीने को।
नवप्रभा विकीर्ण कर / समष्टि बीच बाँट दें,
ज्ञान के कृपाण से / मोह-जाल काट दें।
जिए मनुष्य तो जिए मनुष्य के लिए,
वृक्ष सम बढ़े तो शाख-पात के लिए।" (पृ. ७)

लगता है, इंसानियत की पूजा करना ही नीलकंठ वर्मा जी का ध्येय बन गया है। वे कर्म को ही सर्वस्व समझते हैं, दैनिक पूजन और दिखावे को वे सही नहीं मानते—सही मायनों में वे श्रम से उत्पन्न स्वेदकणों को मानवता की पूजा के लिए साधन मानते हैं:
"आया है, इंसान धरा पर, आज नया बन आया है।
भले आज वह मौन बना है / हाड़-चाम का पिंड सलौना,
एक दिवस चीत्कार करेगा / क़िस्मत का है वही खिलौना।
ना ज्ञान माँगने मंदिर जाएगा / झूठे मंदिर के पूजक से,
साकार ज्ञान को पाएगा / श्रम के उस ज्योति-दीपक से।
श्रम को सम्मान दिलाने का / अधिकार साथ में लाया है।" (पृ. १०)
मगर मानव-कल्याण हेतु राजपथ पर चलते-चलते कवि कच्ची-टूटी सड़कों पर उतरकर अपने दुखों के ख़ास गाँव में पहुँच जाता है, जहाँ उनकी अपनी वह पीड़ा ही परम सुख देने लगती है। बहिर्मुखता की परिधि से लुढ़ककर वह अपनी खोई प्रियतमा की तलाश में केंद्रीकृत हो जाता है—न्यूक्लियस के बिंदु पर आकर बैठ जाता है जहाँ उसे अपरिमेय परितोष मिलता है, शांति मिलती है। लगता है, प्रियतमा की यादों की शीतलता उसे सहलाने-पुचकारने-गुदगुदाने आ जाती है, मानो इन्होंने कविवर राजमणि राय मणि की तरह 'घर आ गई मेरी चाँदनी' कहकर ख़ुशफ़हमी के सागर में गोता लगा लिया हो। कभी रूठी प्रिया सपने में इन्हें दर्शन दे जाती है तो कभी बिना कुछ कहे पलायन कर जाती है और वर्मा जी का घायल हृदय तड़पता रह जाता है:
"प्रेयसि! तुम क्यों लौट न आती...
सुधियों के इस विजन गाँव में,
मुझे चिढ़ाते नभ के तारे,
सपनों के इस सघन छाँव में,
नीलगगन के प्रणय-झील में
भूल रहा हूँ कूल-किनारे।"
सच पूछा जाए तो कविता का निर्माण आँसू रूपी गंगाजल से होता है और ख़ासकर छायावादी परंपरा ने तो आँसुओं की बड़ी-बड़ी दुकानें खोल ली थीं जहाँ सिर्फ़ आँसुओं का व्यापार होता था—क्या प्रसाद, क्या निराला, पंत और महादेवी; और उन्हीं की परंपरा को आत्मसात् करने वाले ज़िले के कवि-द्वय नीलकंठ वर्मा जी एवं राजमणि राय मणि—दोनों अपने-अपने गीतों में निश्चित ही रो-गाकर मन हल्का कर लेते हैं। ज़रा देखें, नीलकंठ वर्मा जी की छायावादी छटपटाहट को, जो आँसुओं में झर-झर बहती है:
"क्यों नयनों में नीर दिए / प्यार छीनकर पीर दिए हो,
छाँह छीन मंदिर जिए हो / किंतु भाव गंभीर दिए हो...
संध्या सुधि के दीप वारती / आहों की जल उठी आरती,
पीड़ा की मीरा पुकारती / क्यों ऐसी तन-पीर दिए हो!..." (पृ. ४)
वास्तव में कवि को किसी सहारे की ज़रूरत नहीं, वह तो यायावर की भाँति नितांत अकेले अपनी यादों की ऊबड़-खाबड़ पगडंडी पर अग्रसर होता रहता है—भले ही चहुँओर घनघोर अँधेरे का साम्राज्य फैला हो, मगर कवि तो अपनी मंज़िल तक, प्रियतमा के आवास तक, उसके आँचल के किनारे तक पहुँचने की ज़िद ठाने हुए है। और कहीं उनके पाँव डगमगाए हैं, इनकी गाड़ी 'डिरेल' भी हुई है, तो वहीं पर गीतों का सृजन भी हो जाता है। लगता है, कवि को अपना अभीष्ट मिलने-मिलने को है, तभी तो वह मिलन की आतुरता में गाने लगता है:
"आज बीन के तारों पर / कहाँ सखे! मैं कैसे गाऊँ,
ममता के सांकल में बँध कर / सदा हृदय को स्वयं छला हूँ।
विकृत रूप अहं को लेकर / महानाश की ओर चला हूँ।
आज ध्वंस के धूमिल पथ पर / कैसे डगमगाए पाँव बढ़ाऊँ।
उस नगरी को जाऊँ कैसे / कभी जहाँ से लौट न पाता,
जीवन की यह साध शेष है / सूनेपन में मैं खो जाऊँ।"
महाकवि जयशंकर प्रसाद की तरह यह कवि भी 'खोलो प्रियतम खोलो द्वार' की रट लगाए पता नहीं क्यों जानकर भी अनजान बना हुआ है—ठीक वैसे ही जैसे कोई 'डायबिटिक' व्यक्ति मिठाइयों को घातक समझते हुए भी खाने की ज़िद कर जाता है। कवि नीलकंठ वर्मा जी की भी यह मजबूरी है। अपने कविकर्म और प्रिया-स्मरण धर्म का निर्वहन भी वे उस चर्मरोगी की तरह—जो अपने प्रभावित अंगों को खुजलाने में ही तृप्ति पाता है—मेरा यह प्रिय कवि भी अपनी प्रिया और उनकी मोहब्बत की तलाश में निरंतरता बनाए रखता है। कहीं पर भी शिथिल नहीं होता; वही गंभीरता, वही शिद्दत मुद्दतों से बनी हुई है। देखें:

"रही लेखनी रोती निशि-भर, पर मैं गीत नहीं लिख पाया।
हर द्राक्षा के मृदु आसव से / मैंने आज कंठ भिगोया,
औ' सुधियों की हर शबनम से / मैंने अपना मर्म न धोया।
हर उपचार हुआ निष्फल तो, उर का घाव नहीं भर पाया।" (पृ. ४/२)
डॉक्टर भी स्वयं और रोगी भी स्वयं हो तो रोग कभी छूटने से रहा। और ऐसा ही व्यक्ति अपने दीपक की लौ को किसी बाहरी झोंकों से बचाते हुए स्वयं तुलसी-चौरे पर अर्पित करने की तमन्ना में संध्या आरती अकेले गाता रह जाता है। इनकी आंतरिक पीड़ा को कोई अन्य भला कैसे जाने—अपनी विवशता रूपी रोग के लक्षण भी बतलाने से रहा यह कवि:
"नींद निगोड़ी—मन-नीड़ तक / आने से यूँ शरमाती थी,
जाने किस ममता की मूरत / रात-रात भर भरमाती थी।
पुष्ट तृप्ति का तुलसी-चौरा, जिस पर दीप नहीं धर पाया।
रही लेखनी रोती निशि-भर, पर मैं गीत नहीं लिख पाया।"
चिकित्सक और कवि की भाषा और लिखावट पढ़ना आसान नहीं होता। डॉक्टरों के 'लपटुआ-घसिटुआ' अक्षरों की तरह कवि की व्यंजनावृत्त भाषा को अभिधा में पढ़कर कवि की मानसिक अवस्था तक पहुँचा नहीं जा सकता, तो भला दवा की 'परफ़ेक्ट' दुकान तक कैसे पहुँचा जा सकेगा। सही में कवि बैजू बावरा होता है, मजनूँ और फ़रहाद होता है जिसकी भाषा और मनोभाव की जटिलता को समझना आसान नहीं। और यह कवि भी स्वयं हारा नहीं, हराया गया है; नियति के क्रूर हाथों ने इस इंसान को तड़पाने का षड्यंत्र किया है:
"जब अलसाई धरती को / नील अंबर बुला रहा था।
और रजनी के निभृत क्षण में / चाँद सभी को सुला रहा था।
नीरवता के नागदंश का / मैं उपचार नहीं कर पाया!"
कैसे कर पाता यह महाकवि? आपको तो नीलकंठ बनना था, अमर होना था। आपका अभियान ही कुछ ऐसा था जो दूसरों से संभव कहाँ था। आपको तो गरल पान कर अमृत दान करना था:
"मैं जीवन के जर-खंड का / यह गीतिल इतिहास हूँ।
पर-पीड़ा-पंचांग-पृष्ठ पर / शीत प्रीत मलमास हूँ।"
एतदर्थ, हम इस महान कवि नीलकंठ वर्मा जी की वेदनापूरित गीत-गंगा में स्नान कर ही इनके मर्म को, इनकी वेदना की गहराई और साहित्य के लिए इनके महादान को समझ सकते हैं; जो आमरण "हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी, तुम देखी सीता मृगनैनी" का स्वरालाप करते रहे, अप्राप्य को प्राप्य समझकर ढूँढ़ते रहे।


— ज्वाला सांध्यपुष्प
समस्तीपुर, बिहार 



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