दानपेटी सिर पर रखकर प्रधान पुजारी भगवान के द्वार पहुँचा। भगवान भक्त को देखकर नहीं बल्कि उसके सिर पर दानपेटी देखकर दंग रह गए। प्रभु कुछ पूछ पाते, उससे पहले ही प्रधान पुजारी ने कहा – "प्रभु, यह दानपेटी कभी नहीं उठा पाता था क्योंकि दानपेटी सिक्कों से भरी होती थी। अब तो इतना हल्का हो गया है कि इसे सिर पर उठाकर ले आया हूँ। अब आप ही इसे संभालो, आपके भक्तों पर तो चोरी और गबन के आरोप लग रहे हैं। कहीं ऐसा न हो कि यह दानपेटी पूरी तरह खाली ही हो जाए।"
प्रधान पुजारी की परेशानी पर प्रभु विहंस पड़े, मानो उन्हें सब पता हो। तब प्रभु सहज भाव से बोले – "सुबह होने से पहले दानपेटी की राशि पूरे मंदिर परिसर में बिखेर दो। लोग जेबें भरने लगेंगे, पेटी शायद ही कोई भरेगा। इसे भी भगवान की लीला समझ ख़ामोश हो जाएँगे क्योंकि हम्माम में तो सब......।"
तब प्रधान पुजारी दानपेटी लेकर मंदिर परिसर में बिखेरने के लिए दौड़ पड़ा, पर उसकी नींद खुल गई।
— सेवा सदन प्रसाद
मुंबई, महाराष्ट्र
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