फिर मुक्ति कौन चाहता है? (छंदमुक्त) - दोलन राय



​बंधन को बंधन ही नहीं माना, तो मुक्ति की खोज मैं कैसे करती?

मैं तो प्रतीक्षा की ऊर्जा से हर संध्या एक दीप जलाती रही, और उसके कंपन में तुम्हारे लौट आने की आहट सुनती रही।

​तुम्हारा लौट आना किसी उत्सव से कम नहीं लगता था, जैसे लंबे अँधेरे के बाद आँगन में उतर आया हो उजाला।

तुम्हारा प्रेम मुझे केवल आकर्षण नहीं, उत्कर्ष लगता था; तुम्हारा संवाद केवल शब्द नहीं, एक गहरा विमर्श लगता था।

​तुम्हारे साथ मैं स्वयं को खोती नहीं थी, बल्कि और अधिक पा लेती थी। तुम्हारे होने से मेरा संसार छोटा नहीं, अधिक विस्तृत हो जाता था।

समर्पित मन बंधन का भार नहीं जानता, वह तो अपने प्रिय में अपना विस्तार देखता है।

​जिस हृदय ने प्रेम को स्वेच्छा से स्वीकार किया हो, वह बंधन के बोध से ही मुक्त होता है; फिर वह किसी और मुक्ति की खोज क्यों करे?

​प्रेमी बंधन चाहता है— वह किसी के नाम की एक जगह अपने हृदय में सुरक्षित रखना चाहता है।

प्रेमिका समर्पण चाहती है— वह अपने विश्वास का एक निर्मल आकाश रचना चाहती है।

​दोनों ही एक-दूसरे में घर तलाशते हैं, फिर मुक्ति की राह पर कौन निकलता है?

शायद वही, जिसने प्रेम को बंधन समझ लिया हो।

​क्योंकि जिसने प्रेम को अपने संपूर्ण सौंदर्य में जाना है, उसके लिए प्रिय का हाथ थामना ही सबसे बड़ी स्वतंत्रता है।

और जहाँ प्रेम है, स्वीकृति है, प्रतीक्षा है, समर्पण है—वहाँ मुक्ति कोई गंतव्य नहीं, वहाँ तो प्रेम ही मुक्ति का दूसरा नाम है।



​— दोलन राय

      महाराष्ट्र 



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