गाँव में 'शिव चर्चा' का दूसरा नाम सुमित्रा जी थीं। माथे पर चंदन और जुबान पर हमेशा महादेव का नाम; वे जहाँ जातीं, महिलाओं को करुणा और प्रेम का संदेश देतीं। लोग उन्हें साक्षात देवी मानते। यह अलग बात थी कि उनके अपने पति और बेटे के कुकर्मों के कारण अक्सर चौराहे पर पंचायतें बैठती थीं, जिस पर वे मौन साध लेती थीं।
सावन के आखिरी सोमवार को सुमित्रा जी के घर भव्य पूजा थी। पूरा आँगन भजनों से गूंज रहा था। भीड़ में उनके देवर के बच्चे भी बैठे थे—शांत, संस्कारी और अपनी सादगी में बेहद खुश। उनके माता-पिता सुमित्रा जी की तरह धार्मिक नहीं दिखते थे, पर उनके घर में एक सहज सुकून था।
पूजा संपन्न हुई। सुमित्रा जी मुस्कुराते हुए सबको प्रसाद बांटने लगीं, "महादेव सब पर दया रखें।"
तभी उनकी नजर देवर के बच्चों पर पड़ी। वे दोनों हाथ फैलाए कब से प्रसाद का इंतजार कर रहे थे।
अचानक सुमित्रा जी के भीतर छिपी ईर्ष्या जाग उठी। उन्हें लगा—मेरे घर में इतनी पूजा के बाद भी क्लेश और पंचायतें हैं, और इनके बच्चे इतने सुखी और अच्छे कैसे हैं? एक अजीब से खौफ ने उन्हें जकड़ लिया कि कहीं उनके जप-तप का पुण्य और महादेव का आशीर्वाद इन बच्चों के हिस्से न चला जाए।
सुमित्रा जी के हाथ ठिठक गए। बच्चों के फैले हुए हाथों को अनदेखा कर, उन्होंने कड़वाहट से मुंह टेढ़ा किया और थाल समेटकर अंदर कमरे में लौट गईं।
बाहर बैठी महिलाएं अब भी उनके भद्र रूप की महिमा गा रही थीं, और भीतर सुमित्रा जी अपनी जलन की मुट्ठी में भगवान का प्रसाद कैद किए, खुद अपनी ही 'शिव चर्चा' को परास्त कर चुकी थीं।
धार्मिक वाह्याडंबरों की नि:सारता इस कथा के बहाने, अंडरटोन ही सही, सामने आती है। है भी, लोग डर–भय, लोभ–लालच में धर्मभक्ति में होते हैं। धर्म की एक संहारक ’खूबी’ यह है कि धर्म की कृपा से मनुष्य के सभी धतकर्म और खून माफ हो जाते हैं।
जवाब देंहटाएंबहुत शुक्रिया आपका मुसाफिर बैठा जी
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