शुक्रिया (कहानी) – तनुजा सिन्हा

"तुम आज इस ठूँठ पेड़ पर आकर बैठने की ज़िद क्यों कर रही हो, कोयली?"
"तुम्हें याद है, कोयल! यही ठूँठ पेड़ कुछ महीने पहले तक हरा-भरा था। मैं अपना अंडा इसी आम के पेड़ पर बने कौवे के घोंसले में रखती थी और कौवी बहन अपने अंडों के साथ मेरे अंडों को भी सेती थी।"
"हाँ-हाँ, सब कुछ याद है। इस घर के मालिक और मालकिन पक्षियों के लिए दाना-पानी भी रखते थे।"
"हाँ! मालिक की मृत्यु के बाद भी मालकिन का प्रकृति-प्रेम और जीव-प्रेम कम नहीं हुआ था।
वैसाख की एक तपती दोपहर में अपने इसी बच्चे को पानी पिलाते-पिलाते वे स्वयं गिर पड़ीं और सदा के लिए इस संसार से चली गईं।
उनके स्नेह से पल्लवित और पोषित यह वृक्ष भी उनके जाने का दुःख सह न सका और धीरे-धीरे सूख गया।
आज पुरानी यादों को फिर से जीने के लिए मैं इसकी बची-खुची टहनी पर आकर बैठी हूँ, क्योंकि कल कारखाने में काम करने वाला एक मज़दूर जलावन के लिए इसे पूरी तरह काटकर ले जाएगा। तब इसका अस्तित्व भी मिट जाएगा, जैसे मालिक और मालकिन का मिट गया।"

"उनकी कोख से जन्म लेने वाला उनका पहला बच्चा कहाँ है?"
"उनके पहले बच्चे का कुछ भी पता नहीं।"

"ऐसा कैसे हो सकता है कि माँ-बाप को अपने बच्चे का पता न हो और बच्चे को अपने माँ-बाप का?"
"इस दुनिया में सब कुछ संभव है।
मालिक और मालकिन के लगाए इस वृक्ष पर हज़ारों पक्षियों ने अपने घोंसले बनाए, अंडे दिए। उन अंडों से चूजे निकले और फिर वे बड़े होकर पक्षी बन गए।
ठीक वैसे ही मालिक ने भी इस घर को बड़े जतन से बनाया था।
मेरे पुरखे बताते थे कि जब मालकिन पहली बार माँ बनीं, तब उन्होंने उसी खुशी में इस आम का पौधा रोपा था।
उनके बेटे तुषार के साथ-साथ यह पेड़ भी बड़ा होता गया। तुषार का इस पेड़ से गहरा लगाव था। जाड़े के दिनों में मालकिन इसी पेड़ पर झूला बाँधकर तुषार को उसमें लिटा देती थीं। वहीं बैठकर स्वेटर बुनतीं, पक्षियों से बातें करतीं और गुनगुनाती रहतीं।
जब तुषार बड़े हुए तो अपने दोस्तों के साथ इस पेड़ के चारों ओर दौड़ते, तने पर बैठकर कच्ची अमियाँ खाते और कभी-कभी इसकी मजबूत डाल पर झूला डालकर घंटों झूलते रहते।

तुषार बिल्कुल अपने माता-पिता की तरह हँसमुख और संस्कारी थे।
लेकिन जैसे-जैसे वे बड़े होते गए, उनका स्वभाव बदलने लगा। वे बुरी संगति में पड़ गए।
हँसती-खेलती मालकिन बुझी-बुझी रहने लगीं। उनकी आँखें हमेशा सूजी रहती थीं। मालिक को भी दिल की बीमारी हो गई।
हद तो तब हो गई जब एक दिन नशे की हालत में तुषार ने अपनी माँ पर हाथ उठा दिया 

मालिक उनकी इस गलती को पचा नहीं पाए। उन्होंने उन्हें हर हाल में सुधारने की ठान ली। हफ्ते भर के भीतर ही वे उन्हें जबरदस्ती नशामुक्ति केंद्र भेज आए।

तुषार बाबा बहुत रोए। उन्होंने अपनी गलती की माफ़ी भी माँगी। मालकिन तड़पती रहीं, गिड़गिड़ाती रहीं, लेकिन मालिक पर किसी की बात का कोई असर नहीं हुआ।"

"फिर क्या हुआ?"

"पूरे एक साल बाद तुषार बाबा वापस लौटे। उनकी बुरी लत तो छूट चुकी थी, लेकिन उनका स्वभाव पूरी तरह बदल गया था। अब उनके मन में अपने माता-पिता के प्रति गहरी नफ़रत भर चुकी थी।

वापस आने के बाद वे दिनभर पढ़ाई करते और बिल्कुल चुपचाप रहते। मालिक और मालकिन उनके इस बदले हुए व्यवहार को देखकर खुश थे। उन्हें लगा कि उनका बेटा अब सही राह पर लौट आया है। लेकिन एक दिन तुषार बाबा की एक नई ज़िद ने उनकी सारी खुशियाँ कपूर की तरह उड़ा दीं।"

"ऐसी भी क्या ज़िद थी?"

"अमेरिका जाकर पढ़ाई करने की... और फिर हमेशा के लिए वहीं बस जाने की। वे विदेश जाकर अपने माता-पिता से हमेशा के लिए दूर हो जाना चाहते थे। वो मन में यह ठान चुके थे कि जिस पीड़ा का अनुभव उन्हें नशामुक्ति केंद्र में रहकर हुआ, उसी पीड़ा का एहसास वे अपने माता-पिता को भी कराएँगे।"

"लेकिन मालिक ने उन्हें नशामुक्ति केंद्र सज़ा देने के लिए नहीं, बल्कि उनके भले के लिए भेजा था।"

"यह बात तुम, एक पक्षी होकर भी समझ गए, लेकिन तुषार बाबा नहीं समझ पाए।"

"फिर क्या हुआ?"

"मालकिन तुषार बाबा के सामने बहुत रोईं, गिड़गिड़ाईं, लाख समझाया, लेकिन तुषार बाबा बदला लेने का निर्णय कर चुके थे। उन पर मालकिन के आँसुओं का भी कोई असर नहीं हुआ। मालकिन अक्सर इसी पेड़ के नीचे बैठकर घंटों आँसू बहाया करती थीं।

नारियल जैसी कठोर शख़्सियत वाले मालिक भी भीतर-ही-भीतर घुल रहे थे, लेकिन उन्होंने अपने दर्द को कभी चेहरे पर नहीं आने दिया। वे बाहर से हमेशा की तरह कठोर बने रहे।

जब मालिक ने तुषार बाबा को विदेश जाने के लिए पैसे देने से साफ़ इनकार कर दिया, तब उन्होंने आत्महत्या तक की धमकी दे डाली।

बाप-बेटे की इस लड़ाई में सबसे अधिक पिसीं तो मालकिन। उनके लिए बस इतना ही काफ़ी था कि तुषार बाबा जहाँ भी रहें, जीवित और सुरक्षित रहें। यही सोचकर उन्होंने भारी मन से उन्हें विदेश भेजने की अनुमति दे दी।

तुषार बाबा अपने माता-पिता का दिल तोड़कर विदेश चले गए। जाने के बाद उन्होंने कभी पलटकर नहीं देखा। न कोई ख़बर ली, न ही उनसे कोई नाता रखा।

दो वर्ष बाद हृदयगति रुक जाने से मालिक का निधन हो गया। औलाद होते हुए भी वे अंततः बेऔलाद होकर ही इस संसार से विदा हुए।

यह वृक्ष शुरू से अंत तक मालकिन को हर पल सांत्वना देने का प्रयास करता रहा। कभी चिड़ियों के बच्चों की मधुर चीं-चीं सुनकर उनके चेहरे पर मुस्कान खिल उठती, कभी पंडुक के जोड़े का प्रेम देखकर उनकी आँखें चमक उठतीं, तो कभी वे कबूतरों के झुंड से घंटों बातें करतीं। कौवी की ममता देखकर उनका हृदय भर आता।

वे कबूतरों के गले में चिट्ठी बाँधकर अपने बेटे तक संदेश पहुँचाने का प्रयास करतीं, लेकिन अगले ही दिन वही कबूतर उसी वृक्ष पर वह चिट्ठी लिए वापस आ बैठता।

मालकिन उसकी अनकही विवशता समझ जातीं। चुपचाप अपनी आँखों से बहते आँसू पोंछ लेतीं। तभी वही कबूतर उड़कर उनके कंधे पर आ बैठता, मानो स्नेह से उन्हें ढाढ़स बँधा रहा हो।

बच्चे तो दोनों ही थे... एक अपनी माँ को आजीवन शोक में डुबोकर दूर चला गया, और दूसरा अंतिम साँस तक माँ का साथ निभाता रहा। माँ के जाने का ग़म वह भी सह न सका और अंततः स्वयं भी उजड़ गया।"

"हाँ! आज पहली बार जाना कि एक वृक्ष केवल छाया और फल ही नहीं देता, बल्कि किसी का सच्चा साथी भी बन सकता है। कल हम भी नहीं रहेंगे, हमारा अस्तित्व भी मिट जाएगा, जैसे मालिक और मालकिन मिट गए। लेकिन वृक्षों का अस्तित्व कभी नहीं मिटना चाहिए, क्योंकि हरियाली है तो सृष्टि है, और सृष्टि है तो हम हैं।"

"तुम बिल्कुल सही कह रहे हो। लेकिन जिस तेज़ी से इंसान मिट्टी और वृक्षों से अपना नाता तोड़ता जा रहा है, उसी गति से वह अपने ही विनाश की ओर बढ़ रहा है। दुर्भाग्य यह है कि उसे इसका एहसास ही नहीं है। इंसानों को समझना होगा कि प्रकृति है तो हम हैं।"

"कोयली! इस घर की ओर दो-तीन लोग आ रहे हैं। ये कौन हो सकते हैं?"

"अरे! ये तो तुषार बाबा हैं... और उनके साथ उनका वही पुराना मित्र भी है, जो उनके विदेश जाने के बाद भी बराबर मालिक और मालकिन का हालचाल लेने आया करता था। तीसरा व्यक्ति अजनबी है... लेकिन ये लोग अब यहाँ क्या लेने आए हैं?"

"चलो, उनकी बातें सुनने के लिए उनकी छत की मुंडेर पर जाकर बैठते हैं।"

"रमेश, तुम्हारा बहुत-बहुत शुक्रिया। महोदय, आप इस घर की कीमत लगा दीजिए।"

यह सुनते ही दोनों पक्षी स्तब्ध रह गए।

कुछ क्षणों के मौन के बाद कोयली धीमे स्वर में बोली, "आज तक मुझे ईश्वर से यही शिकायत रहती थी कि उन्होंने मुझे पक्षी-योनि में जन्म क्यों दिया, मनुष्य क्यों नहीं बनाया। लेकिन आज... आज पहली बार मैं ईश्वर का 'शुक्रिया' अदा कर रही हूँ कि उन्होंने मुझे पक्षी बनाया, मनुष्य नहीं।"

दोनों पक्षियों ने एक बार उस सूखे ठूँठ को भर नज़र देखा। मानो उसके त्याग, प्रेम और मौन पीड़ा को प्रणाम कर रहे हों। फिर वे अपने पंख फैलाकर अनंत आकाश की ओर उड़ गए। 


– तनुजा सिन्हा
पटना (बिहार) की हिंदी एवं भोजपुरी लेखिका, कहानीकार और कंटेंट राइटर। पिछले 7–8 वर्षों से साहित्य और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय । आकाशवाणी एवं बिहार दूरदर्शन के विभिन्न कार्यक्रमों में सहभागिता। 

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