आभासी मित्रता (लघुकथा) - डॉ. प्रीति सुमन


पाँच साल। सात महीने। और अनगिनत बातें।
सृष्टि और अमित के बीच का फासला सिर्फ दो अलग-अलग शहरों का नहीं था, बल्कि हजारों किलोमीटर की भौतिक दूरी का था। लेकिन इस दूरी को उनके शब्दों ने पाट दिया था। एक टूटे हुए रिश्ते के मलबे के बीच सोशल मीडिया पर सृष्टि को अमित मिला था। दोनों ने एकदूसरे को अपना सबसे सुरक्षित दोस्त समझा था। अमित सृष्टि के लिखे हर शब्द को समझता था, और सृष्टि अमित की खामोशियों को पढ़ लेती थी। सोशल मीडिया के इनबॉक्स में उनकी आत्माएं जैसे एक-दूसरे से रोज मिलती थीं।
और आज, वह दिन आया था जब यह फासला मिटने वाला था। अमित सृष्टि के शहर आ रहा था।
सृष्टि का दिल अजीब सी हलचल से भरा था। उसने अपने पसंदीदा रंग का कुर्ता पहना, आईने में खुद को देखा और एक गहरी सांस लेकर कैफे की तरफ निकल पड़ी। रास्ते में हर कदम के साथ पाँच साल की वह मासूम दोस्ती उसकी आँखों के सामने तैर रही थी—वो देर रात तक की बातें, वो सुख-दुख साझा करना, वो एक-दूसरे का संबल बनना।
तभी फोन वाइब्रेट हुआ। अमित का मैसेज था।
सृष्टि ने मुस्कुराते हुए स्क्रीन अनलॉक की, लेकिन अगली ही अनपेक्षित पंक्तियों को पढ़कर उसके कदम जहाँ के तहाँ ठिठक गए।
अमित ने लिखा था: “सृष्टि, मैं कैफे के बजाय सीधे होटल के रूम नंबर ३०४ में रुक रहा हूँ। पाँच साल का इंतजार छोटा नहीं होता। आज मैं तुम्हें सिर्फ देखना नहीं चाहता, मैं तुम्हें पूरी तरह महसूस करना चाहता हूँ। हमारे बीच अब कोई पर्दा नहीं होना चाहिए। तुम सीधे रूम में आ जाओ, प्लीज मना मत करना।”
सृष्टि ने उस मैसेज को दो बार पढ़ा। उसे लगा शायद वह कुछ गलत समझ रही है। लेकिन शब्दों का अर्थ साफ था, और उनके पीछे छिपी 'शर्त' और भी साफ थी। 
सृष्टि कैफे वाले मोड़ पर खड़ी थी। सामने से बस कुछ ही मीटर की दूरी पर वह होटल दिख रहा था।
सृष्टि ने फोन जेब में रखा और बिना एक पल गँवाए वापस अपने घर की राह पर मुड़ गई। अमित होटल के कमरे में बैठकर 'फासले' मिटने का हिसाब लगाता रह गया और सृष्टि को समझ आ गया कि इस आभासी दुनिया की मित्रता का सच बस यहीं तक था।

2 टिप्पणियाँ

और नया पुराने
बोधायन पत्रिका
बोधायन पत्रिका