गाँव चलो जी गाँव चलो,
वट-पीपल की छाँव चलो।
गाँव में है ताल-तलैया,
कौआ-कोयल और गौरैया।
इन सबका दर्शन करने को,
सरपट अपने गाँव चलो।
गाँव चलो...
सुबह पपीहा पी-पी बोले,
अपनी बोली में रस घोले।
इनकी बोली भी सुनने को,
झटपट अपने गाँव चलो।
गाँव चलो...
गाय-बछिया, तोते-मैना,
बहुत दिनों से दिखे नहीं हैं—
इन सबसे मिलने-जुलने को,
जल्दी अपने गाँव चलो।
गाँव चलो...
घास पर टिकी ओस की बूँदें,
ठंडी-ठंडी सी राहत देतीं।
इनको छूने की चाहत से,
अपने नंगे पाँव चलो।
गाँव चलो...
दादा-दादी बाट जोहते,
हम सब जब शहरों में होते—
उनसे मिलने को हम सब,
उस उत्सव की ठाँव चलें।
गाँव चलें...
— डॉ. पुष्पा गुप्ता
(लीचीपुरम, मुज़फ़्फ़रपुर, बिहार)