अर्ध-नग्न शरीर पर
मैले-कुचैले-फटे कपड़े पहने,
गोद में बच्चा लिए
सड़क के किनारे एक भिखारिन
भिक्षा माँग रही है।
आज़ादी के अमृत महोत्सव वर्ष में,
देश के इक्कीसवीं सदी में
पहुँचने के हर्ष में,
महिला-कल्याण औ' ग़रीबी—
उन्मूलन पर कटाक्ष करती हुई—
व्यथित हो शायद वह भिखारिन
भिक्षा नहीं माँग रही, बल्कि
हर आगंतुक से पूछ रही है
कि इक्कीसवीं सदी में क्या
मुझ जैसी अभागिन महिलाओं
की दशा यही है?
— विलोक रंजन "विभाकर"
(सहायक प्रशाखा पदाधिकारी, बिहार विधानसभा, पटना)
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