जागृत अपने सोए मन को, सुनो सखे! करना होगा,
जो भी क़ीमत जीवन की है, तुम्हें उसे भरना होगा।
क्रोधित होकर अपना जीवन, मत ऐसे बरबाद करो,
आत्मदाह करने से पहले, मात-पिता को याद करो,
दर्द पाल के अपने भीतर, ख़ुश तुमको रहना होगा।
हृदय में ले आस की ज्योति, कश्ती लहरों पे चलती है,
काँटों के ही मध्य में देखो, कलियाँ बढ़ती-खिलती हैं,
कठिन परिश्रम से सहरा में, बना कोई झरना होगा।
ग़म की बदली मत छाने दो, खुशियों के इस उपवन में,
देखो कटुता वास न कर ले, निश्चल सुंदर इस मन में
अज्ञानी इस तम को हटाकर, जगमग जग करना होगा।
कहे 'स्वरा' कर ख़ुद पे भरोसा, नहीं कहीं फरियाद करो,
पीड़ाओं को झेल-झेल कर, ख़ुद को तुम फ़ौलाद करो,
राह बता देगा कोई पर, डगर तुम्हें चलना होगा।
— डॉ. स्वराक्षी स्वरा
(खगड़िया, बिहार)