हाशिये पर खड़ा आदमी
धूप में झुलस जाता है मूक होकर,
क्योंकि वह सूरज के ख़िलाफ़ विद्रोह
नहीं करना जानता।
वह हवा के ख़िलाफ़
बग़ावत नहीं करना चाहता,
क्योंकि उसे हवा का न तो रुख़ भाँपना
आता है और न ही
हवा के साथ-साथ चलना।
हाशिये का आदमी
इतना भोला है आज भी कि
बरसने और गरजने वाले बादलों
में फ़र्क़ नहीं कर पाता
और हर बार ठगा जाता है।
इतना निहत्था है यह
कि इससे सभी हथियार
छीन लिए गए हैं, ताकि
यह कभी सत्ता के ख़िलाफ़
विद्रोह न कर सके।
प्रलोभनों की प्रवंचना और यथार्थ की
इबारत के बीच खिंची महीन रेखा
इसे न तो पढ़नी आती है, न वाचनी,
इसलिए हर बार इसके हिस्से
भूख लिख दी जाती है।
हर चक्रव्यूह इसके आसपास ही
रचा जाता है
और हर बार इसी का वध हो जाता है।
बड़े-बड़े बैनरों-नारों के बीच
इसका हिस्सा बाँटने वाले
हर बार खा जाते हैं।
वह न आँकड़ों का गणित जानता है
और न ही भाषणों की प्रवंचना,
हर बार वह पत्तों की तरह
नारों की बयार में बह जाता है।
- अशोक दर्द
हिमाचल प्रदेश भाषा एवं संस्कृति अकादमी शिमला के पूर्व सदस्य
सम्प्रति पता –अशोक ‘दर्द गांव घाट डाकघर शेरपुर तह. डलहौज़ी जि. चम्बा हिमाचल प्रदेश
लेखन विधाएं -कविता ,कहानी, लघुकथा,बाल कविता साक्षात्कार,यात्रा वृतांत, समीक्षा ,हिमाचली लोक साहित्य एवम् सांस्कृतिक लेखन
लेखन विवरण ------ विगत तीस वर्षों से निरंतर हिंदी व पहाड़ी की विभिन्न विधाओं में देश की दर्जनों नामचीन पत्र - पत्रिकाओं में लेखन व प्रकाशन ।
कई कैसेट्स में हिमाचली गीत व भजन लेखन
प्रकाशित कृतियाँ –अंजुरी भर शब्द (कविता संग्रह )
मेरे पहाड़ में - कविता संग्रह (सम्पादित )
महकते पहाड़ - कविता संग्रह( संपादित)
संवेदना के फूल --- (कविता संग्रह)
धूप छांव - कविता संग्रह
सिंदूरी धूप- (कहानी संग्रह )
बटोही -कविता संग्रह
हिमाचली कविता संग्रह - ख्यालां दी खुशबू
हिमाचली लोक कथा संग्रह - लोक कथा कलश
लगभग तीस संकलनों (संपादित)में कविताएं लघुकथाएं कहानियां लोक कथाएं इत्यादि संकलित
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