का करी बरसे न रिमझिम फुहार (भोजपुरी कविता) - किरण कुमारी

जब आवत रहे सावन के पहला सोमवार,
तब करत रहली धरती हरिहर सिंगार।
मिली झूला झूलत रहली सखिया सभे,
गावत रहली कजरी करके, केहुके इंतजार.... 2

बरसेला बदरा कभी रिमझिम फुहार,
बहेला शीतल कभी पूरबी बयार।
गावेली गीत रोपनी, रोपेली धान,
लइह पिया चुनरी हरिहर चूड़ी कचनार,
करेला केहू ,केहू के. इंतजार...

बचपन के ओका-बोका गुड़िया के शृंगार,
नाहीं केहू खेलेला डोलिया -कहार।
गौरैया के खोता न कबूतर के डार,
ऑनलाइन आवे अब राखी के तार।
करेला केहू,केहू के इंतजार...

अब न बरसता बदरा न पूरबी बयार,
अब ना करेला केहु,केहु के इंतजार।
बाटे सुखाइल सभे खेत किसान,
झुला न लागल न रोपाइल बा धान।
का केहू करी केहू के इंतजार...

गिरबी बा गहना घर खेत बखार,
मांगेगा टैक्स,एहपर सरकार।
बरसीं न जलधर सब करे मनुहार,
केहू फँसरी लगावे , केहू करे गुहार,
काहे केहू दुल्हीन करे इंतजार .....
का करी बरसे न रिमझिम फुहार.............


- किरण कुमारी 
   भभुआ, बिहार 


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