कवि रसखान: कृष्ण भक्ति और साम्प्रदायिक सौहार्द के अमर प्रतीक (कालजयी रचनाकार)

हिंदी साहित्य के भक्ति काल में जहाँ एक ओर अनेक हिंदू कवियों ने ईश्वर की आराधना की, वहीं दूसरी ओर कुछ ऐसे मुस्लिम कवि भी हुए जिन्होंने अपनी अनन्य भक्ति से साम्प्रदायिक सौहार्द की एक अनूठी मिसाल पेश की। इन कवियों में रसखान का नाम सर्वोपरि है। जैसा कि उनके नाम से ही स्पष्ट है—'रस की खान'—उनकी कविता का प्रत्येक शब्द कृष्ण भक्ति के रस में डूबा हुआ है। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने रसखान जैसे सूफी और मुस्लिम कृष्ण भक्तों की महिमा में ठीक ही कहा था:
"इन मुसलमान हरिजनन पर, कोटिन हिंदू वारिये।"
जीवन परिचय और जन्म
रसखान का वास्तविक नाम सैयद इब्राहिम था। उनका जन्म 16वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में (अनुमानतः सन् 1548 ई. के आसपास) दिल्ली के एक संपन्न पठान परिवार में हुआ था। वे उच्च कुल के थे और उनका जीवन ऐश्वर्यपूर्ण था। परंतु, उनका मन सांसारिक सुख-सुविधाओं में अधिक समय तक नहीं रमा।
लौकिक प्रेम से अलौकिक प्रेम की ओर उनके मुड़ने के विषय में कई कथाएँ प्रचलित हैं। कहा जाता है कि वे दिल्ली के किसी रूपवान पर आसक्त थे, परंतु जब उन्हें वैष्णव ग्रंथों में भगवान श्रीकृष्ण के प्रति गोपियों के अनन्य और निश्छल प्रेम का बोध हुआ, तो उनका वह लौकिक प्रेम, ईश्वरीय प्रेम में बदल गया। वे दिल्ली छोड़कर ब्रजभूमि आ गए और यहीं के होकर रह गए। ब्रज में आकर उन्होंने गोस्वामी विट्ठलनाथ जी से दीक्षा ली और पुष्टि मार्ग के अनन्य भक्त बन गए।

रसखान की भक्ति सगुण रूप की भक्ति है। वे श्रीकृष्ण के बाल रूप, उनकी रासलीला, मुरली की तान, और उनकी रूप-माधुरी के प्रति पूरी तरह समर्पित थे। उनकी भक्ति में कोई आडंबर या दिखावा नहीं था; वह तो हृदय की सहज और शुद्ध अभिव्यक्ति थी।
वे केवल कृष्ण से ही नहीं, बल्कि ब्रज की प्रकृति, वहाँ की धूल, गायों, गोवर्धन पर्वत और यमुना के किनारे से भी अगाध प्रेम करते थे। उनका मानना था कि यदि अगला जन्म मिले, तो वे ब्रजभूमि में ही जनम लें। उनके एक प्रसिद्ध सवैये में यह भाव स्पष्ट दिखता है:
"मानुष हों तो वही रसखानि बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन।"
"जौ पसु हों तो कहा बस मेरो चरौं नित नंद की धेनु मंझारन।."

रसखान की प्रमुख रूप से दो रचनाएँ अत्यंत प्रसिद्ध हैं:
सुजान रसखान: इसमें कवित्त और सवैये संकलित हैं, जिनमें कृष्ण के प्रति अगाध प्रेम व्यक्त हुआ है।
प्रेमवाटिका: इसमें दोहा छंद में प्रेम के गूढ़ और आध्यात्मिक स्वरूप का निरूपण किया गया है।

 रसखान ने अपनी काव्य रचना के लिए ब्रजभाषा को चुना। उनकी ब्रजभाषा अत्यंत सरल, स्वाभाविक, सरस और मधुर है। उसमें कहीं भी कृत्रिमता या शब्दों का जबरन भराव नहीं दिखता। उन्होंने मुहावरों का बहुत सुंदर प्रयोग किया है जिससे भाषा की सजीवता बढ़ गई है।
                     रसखान को 'सवैय्या' छंद का सिद्धहस्त कवि माना जाता है। जितने सुंदर, गेय (गाने योग्य) और प्रवाहमयी सवैये रसखान ने लिखे हैं, उतने हिंदी साहित्य में विरले ही मिलते हैं। उनके सवैयों की लयबद्धता पाठकों को सीधे कृष्ण की मुरली की धुन से जोड़ देती है।
                  रसखान का व्यक्तित्व और उनका साहित्य भारतीय संस्कृति की गंगा-जमुनी तहज़ीब का सबसे बड़ा उदाहरण है। उन्होंने धर्म और जाति की संकीर्ण दीवारों को तोड़कर यह सिद्ध किया कि ईश्वर की भक्ति पर किसी एक वर्ग का एकाधिकार नहीं है। एक पठान होकर भी उन्होंने हिंदू आराध्य श्रीकृष्ण को जिस आत्मीयता से भजा, उसने मध्यकाल के समाज में आपसी सद्भाव का एक नया मार्ग प्रशस्त किया।

कवि रसखान हिंदी साहित्य के आकाश के वह दैदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिनकी चमक युगों-युगों तक फीकी नहीं पड़ सकती। उनका जीवन और उनका काव्य हमें सिखाता है कि प्रेम का वास्तविक स्वरूप सर्वस्व समर्पण है। सांसारिक वैभव को त्यागकर ब्रज की कुंजों में श्रीकृष्ण की लाठी और कामरी (कमली) पर तीनों लोकों का राज न्योछावर करने की चाह रखने वाले रसखान, सही अर्थों में रस की अक्षुण्ण खान हैं। उनका काव्य आज भी हर कृष्ण भक्त और साहित्य प्रेमी के हृदय में गूँजता रहता है।

साभार: 'बोधायन पत्रिका' के 'वैचारिक एवं साहित्यिक' स्तंभ में प्रकाशित यह विशेष आलेख 'कवि रसखान: कृष्ण भक्ति और साम्प्रदायिक सौहार्द के अमर प्रतीक', प्रधान संपादक मंडल के सहयोग से तैयार किया गया है। इस शोधपरक सामग्री के संकलन और संपादन के लिए हम 'विद्वत परिषद' और सहायक शोधकर्ताओं के प्रति आभार व्यक्त करते हैं।

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