पंडा और पिस्तौल(लघुकथा) - मुसाफ़िर बैठा


सन 1986 की घटना है। उन दिनों मैं राजकीय पॉलिटेक्निक, बरौनी में सिविल इंजीनियरी डिप्लोमा का छात्र था। मोहनिया (रोहतास) के निवासी एक सहपाठी की शादी में बनारस बारात गया था। समय निकालकर हम चार युवा बाराती सुप्रसिद्ध काशी विश्वनाथ मंदिर पहुंचे। और लोग दर्शन के निमित्त गए थे, पर मैं निरा दर्शक था। मेरे साथ के बाक़ी लोगों के लिए यह पुण्य-लाभ कमाने का मौक़ा भी था। वे तैयारी के साथ गए थे। वे अपने पहने कपड़े उतारकर एवं स्नान के बाद पहनने के कपड़े मुझे थमाकर, स्नान के लिए मंदिर के पास के गंगा के राजेंद्र घाट पर उतर गए। श्रद्धालुओं के कपड़े रखने एवं स्नान के बाद उनके माथे पर टीका लगाने आदि के लिए घाट पर अनेक पंडे बैठे हुए थे। एक पंडा, जिसके समीप मैं अपने साथियों के कपड़े थामे खड़ा था, ने वे कपड़े अपने पास रख देने का इशारा भी किया। पर मैंने भी इशारे में ही मना कर दिया।
जब मेरे साथियों ने स्नान के बाद कपड़े पहन लिए, तो इस पंडे ने उन्हें तिलक लगवाने के लिए इशारे से अपने पास आने को कहा। वे पंडे के इशारे पर ध्यान दिए बग़ैर मेरे साथ सीढ़ियों पर ऊपर चढ़ने लगे। पंडा झट उठ खड़ा हुआ एवं हमारा रास्ता सामने से रोककर पैसे माँग बैठा। हमने यह कहकर उसे पैसे देने से इनकार किया कि हमने तो आपकी कोई सेवा ली ही नहीं। इतना होना था कि पंडा आपे से बाहर आ गया और गर्जना करते हुए घोषणा की— "सेवा लो या न लो, पैसे कैसे नहीं दोगे बच्चू! पैसे तो पिस्तौल के हाथों लूँगा।"
पंडे का यह रौद्र और अप्रत्याशित रूप देखकर हम सब अवाक और भयाक्रांत थे। हम डरे-सहमे सहज ही अपना पक्ष रखने की कोशिश में थे। पंडित-गर्जना ने आसपास के लोगों का सहज ही ध्यानाकर्षण किया! पास से कई पंडे और लोगबाग हमारे इर्द-गिर्द जुट गए। उन्होंने बीच-बचाव कर पंड-पचड़े से छुड़ाया और चले जाने को कहा। पंचों की भाव-भंगिमा भी हमारे विरुद्ध ही थी। समझिए, हम पंडे की लंठई का शिकार होने से बाल-बाल बचे थे। फौरन नौ दो ग्यारह हो लिए।

- मुसाफ़िर बैठा

जन्म तिथि - 05 जून, 1968 

जन्म स्थल – ग्राम – बंगराहा, जिला – सीतामढ़ी, राज्य – बिहार।


1 टिप्पणियाँ

  1. प्रीति जी, मेरी लघु कथा प्रकाशित करने के लिए आभार। (मुसाफ़िर बैठा)

    जवाब देंहटाएं
और नया पुराने
बोधायन पत्रिका
बोधायन पत्रिका