बस एक कॉल और मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। माता-पिता जी सकुशल कुंभ मेले में पहुँच गए। अपनी व्यस्तता की वजह से माता-पिता जी के अनुरोध के बावजूद तीर्थस्थलों के दर्शन का कार्यक्रम न बना सका। पर अब उलाहना नहीं सुनना पड़ेगा। सब इंतजाम करके भेज दिया— पूजन की सामग्री और राह-खर्च के साथ।
पर कभी-कभी मन के कोने से आवाज उठती— हजारों-लाखों की भीड़ में उनकी वृद्धावस्था...... शायद अकेले नहीं भेजना चाहिए था। पर मेरे अंदर का श्रवण कुमार तो कभी का मर चुका था; फिर दूसरा मन कहता— मौत तो कहीं भी, कभी भी, किसी को भी अपनी आगोश में ले सकती है।
विचारों के द्वंद्व में उलझा था कि तभी टीवी पर समाचार आया— कुंभ मेले में भगदड़.... कुछ लोग दब गए...... कुछ कुचलकर मर गए और घायलों में ज्यादातर बुजुर्ग हैं।
मैं सिहर उठा। चिंतित हो गया। थोड़ी देर के बाद व्हाट्सएप पर एक मैसेज आया....... मैसेज नहीं......... एक फोटो आई— मृत माता-पिता की तस्वीर। मैंने चीखना चाहा, पर आवाज अटक गई।
- सेवा सदन प्रसाद
मुंबई, महाराष्ट्र