दीनबंधु के बाबूजी लम्मा बेमारी से गुजर गेलथिन। एक्कर जेतना कमाएल-खटाएल रूपइआ जमा रहई, से इलाजे में खतम हो गेलई। करजो-गोआम हो गेलई।
तेराती के पंडीजी से कहलकइन – “पंडीजी, हमरा सकान न हए। एह लेल बाबूजी के सराध गया में करब।”
पंडीजी कहलथिन – “जइसन इच्छा। सरधा से सराध होइत हए।”
दीनबंधु के बड़का भाई धन्नू सुन लेलकई। तुरंते ई खबर गोतिया-देआद में पसार के पाँच गो पंच के जुटा के दुरा पर बइठा देलकई। दीनबंधु के बोलाएल गेल।
धन्नू कहे लगलई – “आई बाबूजी के तेराती हई। तेराती के बाद सराध के चिट्ठा बनाएल जाइत हई। ई लोग पूछे अइलथुन ह कि बाबूजी के सराध कइसे-कइसे करबे? पंच लोग चिट्ठा बनत्थिन।”
दीनबंधु कहलकई – “पंच लोग बाबूजी के इलाज ला पइसा देलथिन रहे, जे आज भोज के चिट्ठा बनत्थिन? हम बिहान गयाजी जा रहल हती।”
पंच में से एगोटा उठ के बोले लगलई – “बाबूजी खेत छोड़ के गेलथुन ह न! एक कट्ठा बेच ले। थई-थई हो जतऊ। हुनको अतमा जुरा जतइन।”
दीनबंधु – “हम त बीत्तो भर खेत न बेचब। बाप-दादा के अरजल में हमरा बेचे के कोन अधिकार?”
पंच सब एक्के मुंहे – “हो! आई से एक्कर भात काटs। अब त हुक्का-पानी न चलइत हए। समाज में एक्कर उठन-बइठन बंद कराबs।”
दीनबंधु – “हमरा मंजूर हए।”
- डॉ. विद्या चौधरी
पटना, बिहार