इक दीया चाहिए रौशनी के लिए,
राह में जो जले हर किसी के लिए।
कोई ख़्वाहिश नहीं माल-ओ-ज़र की मुझे,
बस दुआ चाहिए ज़िंदगी के लिए।
कोई दूजा नहीं एक ही रास्ता,
नेक दिल चाहिए बंदगी के लिए।
हादसे ज़िंदगी के सिखाते रहे,
होते ग़म भी ज़रूरी ख़ुशी के लिए।
तेरी बातों में है ऐसी जादूगरी,
और क्या चाहिए बेख़ुदी के लिए।
सबको अपना ख़सारा नज़र आ गया,
कौन रोता है वरना किसी के लिए।
ज़िंदगी हर क़दम आज़माती रही,
ज़ीस्त है इम्तिहाँ आदमी के लिए।
फ़िक्र कल की करेंगे जो कल आएगा,
कोई सूरत तो निकले अभी के लिए।
इतना आसाँ नहीं शेर कहना 'लता',
दर्द-ए-दिल चाहिए शायरी के लिए।
— रंजनालता, समस्तीपुर (बिहार)