​ख़ुशबू गुलों की बनके बिखरते रहे हैं हम( ग़ज़ल) - आर. पी. घायल


​ख़ुशबू गुलों की बनके बिखरते रहे हैं हम,

दामन किसी का प्यार से भरते रहे हैं हम।


​हमसे कभी भी भूल से रुस्वा कोई न हो,

ऐसी किसी रुसवाई से डरते रहे हैं हम।


​दिल को सुकून है कि हम यादों में खो गए,

बन-बनके आँसू आँख से झरते रहे हैं हम।


​पत्थर हमारी आह से पिघलेगा एक रोज़,

आहें इसी उम्मीद में भरते रहे हैं हम।


​कैसे बताएँ आपको कि आँख मूंदकर,

दीदार उसके हुस्न का करते रहे हैं हम।


​'घायल' वफ़ा के नाम से परहेज़ है जिसे,

उस बेवफ़ा से भी वफ़ा करते रहे हैं हम।

- आर. पी. घायल
पटना, बिहार 

परिचय 

2. निवास - स्थान ---भूतनाथ रोड, पटना, बिहार 
3.सेवा क्षेत्र ----भारतीय रिज़र्व बैंक, पटना और मुंबई 
4. प्रकाशित पुस्तकें ----1 लपटों के दरमियाँ 
2. अज़ीमाबाद की ख़ुशबू 
5. प्रसारण ----आकाशवाणी और दूरदर्शन केंद्र, मुंबई और पटना से ग़ज़लों का प्रसारण तथा www.radiosabrang.com के sursangeet से भी ग़ज़लों का प्रसारण 
6. कवि सम्मेलनों में भी सक्रिय भागीदारी आदि 
7. सेवानिवृत्त सहायक महाप्रबंधक, भारतीय रिज़र्व बैंक, पटना.

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