पांडवों का साथ देकर, था जिताया कृष्ण ने।
भाव के जंजाल में जब, वीर अर्जुन था घिरा,
रूप अद्भुत स्वप्नदर्शी, था दिखाया कृष्ण ने।
छोड़कर गांडीव अपना, भागने योद्धा लगा,
दिव्य गीता ज्ञान को भी, था सुनाया कृष्ण ने।
शिष्य अर्जुन को बनाया, कर दिया सन्मार्ग पर,
सारथी बन सत्य का तब, रथ चलाया कृष्ण ने।
इस नियति के हाथ है सब, और तो कुछ भी नहीं,
युद्ध के मैदान में ही, सच सिखाया कृष्ण ने।
आपको ही देखकर तब, बल मिला था पार्थ को,
मौत की काली घटा से, था बचाया कृष्ण ने।
सख्य के काबिल नहीं जो, आपसे ही जो मिला,
पार्थ कहकर दिल लगाया, फिर बिठाया कृष्ण ने।
- डी एन झा दीपक
देवघर, झारखंड
Tags
कविता