रस के प्रमुख अंग एवं रस के प्रकार (साहित्यिक आलेख)

 
रस-सूत्र के आधार पर रस के चार प्रमुख अंग स्वीकार किए गए हैं:

क. स्थायी भाव
मनुष्य के हृदय में जो भाव सुप्त अवस्था में हमेशा विद्यमान रहते हैं और अनुकूल वातावरण पाते ही जाग्रत हो जाते हैं, उन्हें स्थायी भाव कहते हैं। मूलतः इनकी संख्या 9 मानी गई थी (इसीलिए 'नवरस' कहा जाता है), लेकिन बाद में वात्सल्य और भक्ति को मिलाकर इनकी संख्या 11 हो गई।

ख. विभाव
स्थायी भावों को जगाने वाले (उद्दीप्त करने वाले) कारण या साधन को 'विभाव' कहते हैं। इसके दो भेद हैं:

आलंबन विभाव: जिसके कारण भाव जगे (जैसे नायक के मन में नायिका को देखकर भाव जगे, तो नायिका आलंबन है)। इसमें दो पक्ष होते हैं— आश्रय (जिसके मन में भाव जगे) और विषय (जिसके प्रति भाव जगे)।

उद्दीपन विभाव: वह बाहरी वातावरण या चेष्टाएँ जो जगे हुए भाव को और तीव्र कर दें (जैसे कोयल का कूकना, चाँदनी रात, एकांत स्थान)।

ग. अनुभाव
भाव जाग्रत होने पर आश्रय के शरीर में जो बाहरी चेष्टाएँ दिखाई देती हैं, उन्हें अनुभाव कहते हैं (जैसे डर के मारे काँपना, पसीना आना, आँखों से आँसू बहना)। ये मुख्यतः चार प्रकार के होते हैं: आंगिक/काविक (शरीर की हरकत), वाचिक (वचन), आहार्य (वेशभूषा) और सात्विक (जो स्वतः उत्पन्न होते हैं, जैसे कंपकंपी या अश्रु)।

घ. संचारी या व्यभिचारी भाव
ये वे भाव हैं जो स्थायी भाव के साथ-साथ पानी के बुलबुलों की तरह उठते और विलीन होते रहते हैं। इनकी संख्या 33 मानी गई है (जैसे हर्ष, शंका, चिंता, मोह, गर्व आदि)।

रसों के नाम, उनके स्थायी भाव और उदाहरण

यहाँ मुख्य रसों को उनके स्थायी भाव और प्रसिद्ध काव्य उदाहरणों के साथ समझते हैं:

1. श्रृंगार रस (स्थायी भाव: रति) - इसे 'रसराज' (रसों का राजा) कहा जाता है।

संयोग श्रृंगार (मिलन):
"बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाय।
सोह करै भौंहनु हँसै, दैन कहै नटि जाय।" (बिहारी)

वियोग श्रृंगार (बिछड़ना):
"निसिदिन बरसत नैन हमारे।
सदा रहति पावस ऋतु हम पर, जब ते स्याम सिधारे॥" (सूरदास)

2. वीररस के चार अंग (अवयव)
रस-सूत्र के आधार पर रस के चार प्रमुख अंग स्वीकार किए गए हैं:

क. स्थायी भाव
मनुष्य के हृदय में जो भाव सुप्त अवस्था में हमेशा विद्यमान रहते हैं और अनुकूल वातावरण पाते ही जाग्रत हो जाते हैं, उन्हें स्थायी भाव कहते हैं। मूलतः इनकी संख्या 9 मानी गई थी (इसीलिए 'नवरस' कहा जाता है), लेकिन बाद में वात्सल्य और भक्ति को मिलाकर इनकी संख्या 11 हो गई।

ख. विभाव
स्थायी भावों को जगाने वाले (उद्दीप्त करने वाले) कारण या साधन को 'विभाव' कहते हैं। इसके दो भेद हैं:

आलंबन विभाव: जिसके कारण भाव जगे (जैसे नायक के मन में नायिका को देखकर भाव जगे, तो नायिका आलंबन है)। इसमें दो पक्ष होते हैं— आश्रय (जिसके मन में भाव जगे) और विषय (जिसके प्रति भाव जगे)।

उद्दीपन विभाव: वह बाहरी वातावरण या चेष्टाएँ जो जगे हुए भाव को और तीव्र कर दें (जैसे कोयल का कूकना, चाँदनी रात, एकांत स्थान)।

ग. अनुभाव
भाव जाग्रत होने पर आश्रय के शरीर में जो बाहरी चेष्टाएँ दिखाई देती हैं, उन्हें अनुभाव कहते हैं (जैसे डर के मारे काँपना, पसीना आना, आँखों से आँसू बहना)। ये मुख्यतः चार प्रकार के होते हैं: आंगिक/काविक (शरीर की हरकत), वाचिक (वचन), आहार्य (वेशभूषा) और सात्विक (जो स्वतः उत्पन्न होते हैं, जैसे कंपकंपी या अश्रु)।

घ. संचारी या व्यभिचारी भाव
ये वे भाव हैं जो स्थायी भाव के साथ-साथ पानी के बुलबुलों की तरह उठते और विलीन होते रहते हैं। इनकी संख्या 33 मानी गई है (जैसे हर्ष, शंका, चिंता, मोह, गर्व आदि)।

रसों के नाम, उनके स्थायी भाव और उदाहरण
यहाँ मुख्य रसों को उनके स्थायी भाव और प्रसिद्ध काव्य उदाहरणों के साथ समझते हैं:

1. श्रृंगार रस (स्थायी भाव: रति) - इसे 'रसराज' (रसों का राजा) कहा जाता है।

संयोग श्रृंगार (मिलन):
"बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाय।
सोह करै भौंहनु हँसै, दैन कहै नटि जाय।" (बिहारी)

वियोग श्रृंगार (बिछड़ना):
"निसिदिन बरसत नैन हमारे।
सदा रहति पावस ऋतु हम पर, जब ते स्याम सिधारे॥" (सूरदास)

2. वीर रस (स्थायी भाव: उत्साह)
उदाहरण:
"बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।" (सुभद्रा कुमारी चौहान)

3. करुण रस (स्थायी भाव: शोक)
उदाहरण (निराला जी की सरोज स्मृति से):
"दुख ही जीवन की कथा रही,
क्या कहूँ आज जो नहीं कही!"

4. रौद्र रस (स्थायी भाव: क्रोध)
उदाहरण (रामचरितमानस से, लक्ष्मण-परशुराम संवाद):
"माखूं सभाँ कुँअर दोउ भ्राता। धरे धनुष सर बाहु बिधाता॥
अति रिस बोले बचन कठोरा। कहु जड़ जनक धनुष केहि तोरा॥"

5. शांत रस (स्थायी भाव: निर्वेद/शम) - भरतमुनि ने इसे नाटक में रस नहीं माना था, परंतु काव्य में यह नवम रस है।
उदाहरण:
"मन रे तन कागद का पुतला।
लागै बूँद बिनसि जाय छिन में, गरब करै क्या इतना॥" (कबीर)

6. हास्य रस (स्थायी भाव: हास)
             जब किसी व्यक्ति की अनोखी वेशभूषा, विकृत रूप, विचित्र बातचीत या चेष्टाओं को देखकर हृदय में जो विनोद का भाव जाग्रत होता है, उसे हास्य रस कहते हैं।
उदाहरण (तुलसीदास - रामचरितमानस से):
"विंध्य के वासी उदासी तपोव्रतधारी महा बिनु नारि दुखारे।
गौतम तीय तरी तुलसी सो कथा सुनि भे मुनिवृंद सुखारे॥
ह्वैहैं सिला सब चंद्रमुखी परसे पद मंजुल कंज तिहारे।
कीन्हीं भली रघुनायक जू करुना करि कानन को पगु धारे॥"

(यहाँ हास्य यह है कि विंध्य पर्वत के तपस्वी मुनि इसलिए खुश हो रहे हैं कि श्रीराम के चरण स्पर्श से वहाँ के सारे पत्थर अब सुंदर स्त्रियाँ बन जाएँगे।)

7. भयानक रस (स्थायी भाव: भय)
            किसी भयानक या हिंसक वस्तु/जीव को देखने, शत्रु की भयंकर चेष्टाओं को जानने या अनिष्टकारी घटना के स्मरण से मन में जो व्याकुलता या डर पैदा होता है, उसे भयानक रस कहते हैं।
उदाहरण:
"एक ओर अजगरहि लखि, एक ओर मृगराय।
बिकल बटोही बीच ही, परयो मूरछा खाय॥"

(यहाँ पथिक के एक तरफ अजगर और दूसरी तरफ सिंह (मृगराय) है, जिससे भयभीत होकर वह बीच में ही मूर्छित हो जाता है।)

8. वीभत्स रस (स्थायी भाव: जुगुप्सा / घृणा)
परिभाषा: अत्यंत घृणास्पद वस्तुओं, जैसे—सड़ते हुए मांस, रक्त, विष्ठा, श्मशान के दृश्यों या कटी-फटी लाशों को देखकर या उनके बारे में सुनकर मन में जो घृणा या ग्लानि पैदा होती है, उसे वीभत्स रस कहते हैं।
उदाहरण (भारतेंदु हरिश्चंद्र - सत्य हरिश्चंद्र नाटक से):
"सिर पै बैठ्यो काग, आँखि दोउ खात निकारत।
खींचत जीभहिं स्यार, अतिहि आनंद उर धारत॥
गिद्ध जाँघ को खोदि-खोदि कै मांस उपारत।
स्वान अंगुरिन काटि-काटि कै खात विदारत॥"

(श्मशान घाट का यह दृश्य जुगुप्सा या घृणा का चरम रूप है।)

9. अद्भुत रस (स्थायी भाव: विस्मय / आश्चर्य)
                   किसी अलौकिक, अकल्पनीय या अनोखी वस्तु/घटना को देखकर मन में जो आश्चर्य या अचरज का भाव जाग्रत होता है, उसे अद्भुत रस कहते हैं।
उदाहरण (सेनापति / सूरदास):
"देखि जसोदा सिसु के मुख में, सकल बिस्व की माया।
छनभर को वह भई अचेतन, हिल न सकी कोमल काया॥"

(बालकृष्ण के मुख में ब्रह्मांड के दर्शन करना माता यशौदा के लिए परम विस्मयकारी था।)

10. वात्सल्य रस (स्थायी भाव: वत्सलता / स्नेह)
                          माता-पिता का अपनी संतान के प्रति, बड़ों का बच्चों के प्रति अथवा गुरु का शिष्य के प्रति जो निष्काम और निश्छल प्रेम होता है, उसे वात्सल्य रस कहते हैं। आचार्य विश्वनाथ ने इसे 10वें रस की मान्यता दी।
उदाहरण (सूरदास - वात्सल्य के सम्राट):
"किलकत कान्ह घुटुरुवनि आवत।
मनिमय कनक नंद कै आँगन, बिम्ब पकरिबै धावत॥"

(घुटनों के बल चलते हुए कृष्ण का अपनी ही परछाई पकड़ने की चेष्टा वात्सल्य का अप्रतिम उदाहरण है।)

11. भक्ति रस (स्थायी भाव: भगवद्-विषयक रति / अनुराग)
                                ईश्वर के प्रति परम प्रेम, समर्पण और अनन्य श्रद्धा के भाव को भक्ति रस कहा जाता है। रूप गोस्वामी ने इसे 11वें रस के रूप में स्थापित किया। (ध्यान रहे, श्रृंगार रस में नायक-नायिका का प्रेम होता है, जबकि भक्ति रस में भक्त और भगवान का)।
उदाहरण (मीराबाई):
"मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई।
जाके सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई॥
तात मात भ्रात बंधु, आपनो न कोई।
छांड़ि दई कुल की कान, कहा करिहै कोई॥



- बोधायन पत्रिका 


 

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